ढोल-नगाड़ों की थाप, आतिशबाजी और जगह-जगह मंगलगान। वेदियों पर सर्व मंगल की कामना से जले अखंड दीपों की लौ जन-जन के तन-मन को प्रकाशमान कर रही थी। कोई घुटने तो कोई कमर तक जल में डाला लिए खड़ा था।
गंगा तट पर राजघाट से विश्वसुंदरी पुल तक व्रतियों की अटूट कतार ऐसे ही भक्तिभावों में रमी थी। मौका था, सूर्योपासना के डाला षष्ठी व्रत पर उगते सूर्य को अर्घ्यदान के लिए अरुणोदय की घड़ियां गिनने का। गंगा-वरुणा तटों से कुंडों-सरोवरों तक ब्रह्म मुहूर्त में बाजे-गाजे के बीच लोकोत्सव की अनूठी छटा निखरी।
पूरब के आसमान में लाली छाने के साथ ही हर-हर महादेव और छठी मइया के जयकारे गूंजने लगे। इसी के साथ उगते सूर्यदेव को अर्घ्यदान देकर महिलाओं ने सूर्योपासना के व्रत-अनुष्ठान को सविधि संपन्न किया। चार बजे भोर में ही महिलाएं घर-घर से बाजे-गाजे के साथ निकलीं।
दशाश्वमेध, अस्सी, हनुमान घाट, राजघाट, पंचगंगा घाट के अलावा अन्य तटों पर पहुंचने के लिए सिर पर डाला उठाए व्रतियों और उनके परिवारी जनों की कतारें लग गईं। सिर पर भोग और फूलों, फलों सजे डाला में दीप जलाकर परिवारीजन आगे-आगे चल रहे थे।
घाटों पर पहुंचने के साथ ही षष्ठी माता के गीत गूंजने लगे। गन्ने के मंडपों के नीचे समूहों में बैठी महिलाएं भगवान सूर्य के उगने के इंतजार में मंगलगान और प्रार्थनाएं करने लगीं। तटों पर परिवारीजन आतिशबाजी कर रहे थे।
सूरज की लाली के गंगा की लहरों पर ताम्रमयी रेख बनकर उतरने से पहले ही जयघोष गूंजने लगे। सूर्यदेव की लालिमा छाने के साथ ही अर्घ्यदान आरंभ हो गया। पुत्रों, पतियों ने अर्घ्य दिलाया। इसके बाद व्रतियों के समूह सिर पर दउरा लेकर घरों के लिए निकलने लगे।