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राष्ट्रमंडल खेलः बनारस की बेटी पूनम यादव ने रचा इतिहास, कभी खेलने पर लोग मारते थे ताना

Mon, 09 Apr 2018 01:11 PM IST
टीम डिजिटल,वाराणसी
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पूनम यादव - फोटो : twitter
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आस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में चल रहे राष्ट्रमंडल खेलों के चौथे दिन बनारस की बेटी ने अपना दम दिखाया है। महिला वेटलिफ्टर पूनम यादव ने 69 किलोवर्ग भार स्पर्धा में भारत को पांचवां गोल्ड मेडल दिलाया है। पूनम यादव वाराणसी के दादूपुर गांव की रहने वाली हैं।
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रविवार सुबह उनकी जीत की खबर आने के बाद गांव में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। पूनम यादव किसान परिवार से आती हैं। उनके पिता कैलाश यादव सामान्य किसान हैं। उनके घर पर बधाई देने के लिए हुजूम उमड़ा हुआ है।

पीएम मोदी और राष्ट्रपति ने पूनम यादव की इस स्वर्णिम सफलता पर बधाई दी है। इसके अलावा पूरे देश में पूनम की जीत पर खुशी है। बनारस में उनके घर सुबह से ही शुभकामनाएं देने वालों का तांता लगा हुआ है।
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बता दें कि राष्ट्रमंडल खेलों  खेलों में भारत को अबतक पांच गोल्ड मेडल मिले हैं। ये सभी मेडल वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में ही मिले हैं। 69 किलोवर्ग भार स्पर्धा  पूनम ने कुल 222 किलो का भार उठाकर सोन पर कब्जा जमाया।

उन्होंने स्नैच में 100 किलो का भार उठाकर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया, वहीं क्लीन एंड जर्क में उन्होंने 122 किलोग्राम का भार उठाकर बेहतरीन प्रदर्शन किया। दूसरे स्थान पर  इंग्लैंड की सारा डेविस रहीं।

बेहद गरीबी में बीता पूनम का जीवन

पूनम यादव का परिवार - फोटो : अमर उजाला

पूनम यादव ने स्नैच में पहले प्रयास में 95, दूसरे में 98 और तीसरी कोशिश में 100 वजन उठाया। क्लीन एंड जर्क में उनका सर्वश्रेष्ठ 122 किलोग्राम रहा। इस तरह कुल 222 किलोग्राम वजन उठाकर पूनम ने गोल्ड मेडल अपने नाम किया।

इंग्लैंड की सारा डेविस 217 किलोग्राम के साथ दूसरे नंबर पर रहीं। फ़िजी की अपोलिना वाइवाइ ने 216 किलोग्राम उठाकर कांस्य पदक जीता। 22 साल की पूनम यादव बनारस की रहने वाली हैं। 2014 के ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में 63 किलोग्राम में भारवर्ग में पूनम ने कांस्य पदक जीता था।  


पूनम का घर बनारस के चोलापुर क्षेत्र के दांदूपुर गांव में है। उनके पिता किसान हैं। वहीं पूनम फिलहाल रेलवे में टीटीई हैं। उनकी बड़ी बहन भी वेटलिफ्टर हैं। अभी वो आगरा में टीटीई पद पर तैनात हैं।

पूनम की इस जीत पर उनकी मां उर्मिला की आखों में खुशी के आंसू हैं। उन्होंने   बताया कि कभी हम लोगों को भूखे भी रहना पड़ता था। यहां तक कि बेटी को खेल खिलाने पर लोग ताना मारते थे।

आज पूनम के घर बधाई देने के लिए सुबह से ही लोगों का तांता लगा हुआ है। उन्होंने बताया कि 2014 ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में जब पूनम ने कांस्य पदक जीता था तब हम लोगों के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि मिठाई बांट सके। उस वक्त  पूनम के पिता कहीं से इंतजाम कर के पैसे लाये थे तब घर में खुशियां मनाई गई।

पूनम के पिता कैलाश यादव ने बताया कि एक बार कर्णम मल्लेश्वरी का खेल देखा जिन्होंने ओलंपिक मैच में भारत को गोल्ड मेडल जीता था। बस यहीं से सपना था कि मेरी बेटी भी मेडल लाये। जिसने आज इस सपने को सच कर दिया।
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2014 राष्ट्रमंडल खेलों के लिए नहीं थे पैसे

पूनम यादव - फोटो : twitter
पूनम यादव के पिता कैलाश ने बताया कि पूनम वेटलिफ्टिंग के लिए तैयार हो गई लेकिन उसे विदेश भेजने के पैसे जुटाने में मुश्किल हो रही थी। तब दो भैंसों को बेच दिया और दोस्तों-परिवार वालो से कर्ज लिया। कांस्य पदक लाकर उसने सब सपना मानो पूरा कर दिया।

पूनम ने अपने दम पर सारे उधार के सारे पैसों को चुकाने के बाद  अपना घर भी खड़ा कर दिया है। आज पूरा परिवार उसके संघर्ष को याद नहीं करना चाहता है। पूनम ने अभी स्नातक की पढ़ाई पूरी की है।

वो भारतीय रेलवे में टीटीई की नौकरी भी कर रही हैं। वहीं पूनम यादव ने एशियाड 2014 में सिल्वर मेडल, सीनियर नेशनल 2014 में सिल्वर मेडल, स्कॉटलैंड के ग्लासगो में कॉमनवेल्थ गेम्स 2014 कांस्य पदक जीता था।
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