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नहाय खाय के साथ आज से छठ महापर्व शुरू

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चार दिवसीय छठ महापर्व की शुरुआत नहाय खाय के साथ 31 अक्तूबर से होगी। अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दो नवंबर को दिया जाएगा। कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से महापर्व की शुरुआत होगी और समापन कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होगा। ज्योतिषाचार्य पंडित गणेश प्रसाद मिश्र के अनुसार पहले दिन कार्तिक शुक्ल 31 अक्तूबर को नहाय खाय से पर्व की शुरुआत होगी।
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छठ व्रती स्नान करके शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है। दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी एक नवंबर को व्रतधारी दिनभर का उपवास करने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे खरना कहा जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिठ्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। कार्तिक शुक्ल षष्ठी दो नवंबर को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
शाम को अर्घ्य का समय 5:15 बजे है। चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। अर्घ्य का समय प्रात: 6:15 बजे है। इसके साथ व्रत का समापन होता है। सामाजिक समरसता का महापर्व छठ की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। इस पर्व की सबसे बड़ी बात है कि इसमें धार्मिक भेदभाव, ऊंच नीच, जात-पात भूलकर सभी एक साथ मनाते हैं। सूर्योपासना की यह लोक परंपरा सारे भेद को मिटा देती है। रोशनी और जीवन के प्रमुख स्त्रोत सूर्य की उपासना के दौरान स्वच्छता और शुद्धता का खास ध्यान रखा जाता है। कहते हैं कि इस पूजा में कोई गलती हो तो तुरंत क्षमा याचना करनी चाहिए।
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छठ महापर्व की खास बात है कि यह सभी को एकसूत्र में पिरोने का काम करता है। सभी एक समान विधि से भगवान की पूजा करते हैं। अमीर हो चाहे गरीब सभी मिट्टी के चूल्हे पर ही प्रसाद बनाते हैं। सभी एक साथ गंगा तट पर नजर आते हैं। बांस के बने सूप में अर्घ्य दिया जाता है। प्रसाद भी एक जैसा ही, गंगा और भगवान भाष्कर सबके लिए एक जैसे हैं। पुराणों के अनुसार हिंदू धर्म में मान्यता है कि सूर्य की शक्तियों का मुख्य आधार उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की आराधना की जाती है। सुबह के अर्घ्य में सूर्य की पहली किरण यानी ऊषा और शाम के अर्घ्य में सूर्य की अंतिम किरण यानि प्रत्यूषा को अर्घ्य देकर प्रार्थना की जाती है।
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