गीत, गवनई के साथ लोक आस्था के महापर्व छठ की शुरुआत हो गई। गुरुवार को नहाय खाय की रस्म के साथ डाला षष्ठी का व्रत आरंभ हो गया। शुक्रवार को बखीर का खरना होगा। घरों से गलियों तक छठ माता की स्तुति के गीत गूंजने लगे हैं। स्नान के बाद व्रती महिलाओं ने कद्दू, नया चावल और चने की दाल को ग्रहण कर सूर्य की आराधना के निमित्त आत्म शुद्धता का संकल्प लिया।
गुरुवार को सुबह घर की सफाई करके विधिवत गंगा जल के छिड़काव से पवित्र किया गया। व्रती लोगों के भोजन के बाद घर के अन्य लोगों ने भोजन किया। घर से लेकर घाट तक साफ-सफाई और वेदी के निर्माण में व्रती जुटे रहे। चार दिवसीय महापर्व के लिए घरों को रंगीन झालरों से सजाया गया है। वहीं घाटों पर भी कई जगह रोशनी की गई है। शुक्रवार की शाम को खरना का प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रत शुरू होगा। खरना के दिन पूजा वेदी पर श्रद्धालु चंद्रमा को अर्घ्य देंगे। अस्ताचलगामी सूर्य को दो नवंबर और उदीयमान सूर्य को तीन नवंबर को अर्घ्य अर्पित होगा। गंगा तट, वरुणा तट से लेकर शहर के कुंड और तालाबों पर भी पूजा की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं।
भोजूबीर निवासी व्रती प्रतिमा ने बताया कि वह व्रत के दौरान सभी नियमों का पालन करती हैं। पिछले 12 सालों से व्रत कर रही हैं। पखवारे भर से जमीन पर सो रही हैं। व्रत के दौरान किसी को न कड़वे शब्द बोलेंगी और न झूठ। शुचिता के ऊंचे मानकों पर खरा उतरने की कोशिश की जाएगी। शुक्रवार को खरना करेंगी। दिन भर व्रत रहने के बाद गुड़-दूध की बखीर बनाएंगी। बखीर खाने के बाद उसको प्रसाद के रूप में वितरित किया जाएगा। इसके बाद निराजल व्रत आरंभ होगा।