एक चुटकी राख के लिए मच गई थी भगदड़
आजाद के अंतिम संस्कार में क्रांतिकारी शचिंद्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल भी आई थीं। उन्होंने अपने संबोधन में कहा था कि जब खुदीराम बोस को फांसी पर लटकाया गया था तो बंगाल की माताएं उनकी राख लेकर गई थीं और अपने बच्चों को ताबीज बनाकर दिया था, ताकि वह भी क्रांतिकारी बनें। यह सुन कर भीड़ टूट पड़ी थी और एक चुटकी राख के लिए भगदड़ मच गई थी।
काशी लाया जाए अस्थि कलश
आजाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में 27 फरवरी 1931 को वीरगति को प्राप्त हुए थे। इलाहाबाद में रसूलाबाद घाट पर आजाद का अंतिम संस्कार किया गया था, जहां कमला नेहरू भी आईं थीं। उन्होंने पं. शिव विनायक को भी बुलाया गया था। अंत्येष्टि के बाद अस्थियां लेकर वह बनारस लौट आए थे।
पं. शिव विनायक के पुत्रों श्याम सुंदर मिश्र, राजीव लोचन मिश्र और फूलचंद्र मिश्रा से 10 जुलाई 1976 को अस्थि कलश लेकर लखनऊ संग्रहालय में रखवाया गया था। नित्यानंद राय ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि आजाद की कर्मभूमि काशी थी, इसलिए उनका अस्थि कलश भी यहीं स्थापित किया जाए।
क्रांति की राह चुनने के बाद भी रहते थे फूफा के संपर्क में
आजाद के फुफेरे भाई स्व. राजीव लोचन मिश्र के पुत्र डॉ. कृष्ण मोहन मिश्र के अनुसार, लखनऊ के म्यूजियम में आजाद का अस्थि कलश और उनका हस्तलिखित पत्र रखा गया है। उन्होंने बताया कि देश की आजादी के लिए जब आजाद ने क्रांति की राह चुनी तो उनका कोई निश्चित ठिकाना नहीं रहता था, लेकिन वह अपने फूफा पं. शिव विनायक के संपर्क में रहते थे।
अंग्रेज अफसर को उपहार में दी थी आजाद की पिस्तौल
ब्रिटिश हुकूमत ने अंग्रेज अफसर जॉन नॉट बावर को आजाद की पिस्तौल उपहार के तौर पर दी था। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि ब्रिटिश हुकूमत के लिए बहुत बड़ी सफलता थी। वर्ष 1972 में तत्कालीन केंद्र और प्रदेश सरकार के प्रयास से पिस्तौल वापस मंगवाई गई। पिस्तौल भारत आने के छह महीने बाद ही बावर की मौत हो गई थी।