गंगा पार रेत में नहर को दिया गया था आकार
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पूरी नहर गंगा की गोद में समा गई। इससे विवाद बढ़ा और मामला एनजीटी तक पहुंच गया। इस मामले में एनजीटी का रुख सख्त है। आगामी 14 फरवरी को सिंचाई विभाग के अपर मुख्य सचिव को तलब भी किया गया है। अपर मुख्य सचिव को एनजीटी के समक्ष हाजिर होकर अपना पक्ष रखना है।
मामले में केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय के अधीन आने वाले नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी) को पक्षकार बनाया गया था। लिहाजा, मंत्रालय की तरफ से अब जवाब दाखिल किया गया है। इनलैंड वाटरवेज अथॉरिटी आफ इंडिया के प्रतिनिधि ने कहा कि गंगा में किसी तरह की ड्रेजिंग नहीं की गई है। जब भी ड्रेजिंग करते हैं, तब खोदाई से निकले बालू को नदी 100 से 200 मीटर की दूरी पर रख देते हैं। जिला सर्वे समिति की रिपोर्ट के बाद ही बालू बेची जा सकती है। वाराणसी के मामले में ऑनलाइन संपर्क करने का प्रयास भी नहीं किया गया था।
गंगा पार रेती पर जहां टेंट सिटी बसाई गई है, उसी के आसपास नहर बनाई गई थी। अब नहर नहीं है। टेंट सिटी बस चुकी है। इसमें पर्यटकों के आने का सिलसिला भी शुरू हो गया है। सिटी छह महीने तक गुलजार रहेगी। बारिश व गंगा का जलस्तर बढ़ने से पहले इसे शिफ्ट कर दिया जाएगा। कारण यह है कि जहां सिटी बसी है, वहां गंगा का पानी चढ़ जाता है।
गंगा पार रेती पर जब नहर बनवाने का फैसला हुआ, तब काशी के बुद्धिजीवी और बीएचयू के विशेषज्ञ सामने आए। नदी वैज्ञानिक प्रो यूके चौधरी, प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र व प्रो बीडी त्रिपाठी ने सवाल उठाए और कहा था कि जलस्तर बढ़ने के साथ ही नहर का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। करोड़ों रुपये बेकार हो जाएंगे। जैसे ही नदी का जलस्तर बढ़ा, वैसे ही नहर का अस्तित्व खत्म हो गया। अगर प्रशासनिक अधिकारी वैज्ञानिकों की सलाह मानते तो बड़े नुकसान से बचा जा सकता था। दरअसल, नहर की खोदाई पर 11.95 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे।
सिंचाई विभाग ने तर्क दिया था कि कोरोना काल में जब काम शुरू होना था, तब एक तकनीकी कमेटी बनाई गई थी। कमेटी की रिपोर्ट पर ही नहर का निर्माण कराया गया। अब सवाल उठता है कि तकनीकी कमेटी में कौन-कौन लोग शामिल थे। जहां नहर बनाई ही नहीं जा सकती थी, वहां करोड़ों रुपये खर्च करके नहर बनाने की रिपोर्ट कैसे दी गई? बिना सत्यापन के ही विभागीय अधिकारियों ने रिपोर्ट पर भरोसा कैसे कर लिया? जब जलशक्ति मंत्रालय से खोदाई की अनुमति नहीं थी तो फिर काम कैसे शुरू हुआ? खोदाई से निकली बालू की नीलामी किसने और किस अधिकार से करा दी?