फूलों-लड़ियों से सजी नावें-बजड़े, उस पर बिछी चांदनी-मसनद, शमादान, झंडियां, गलीचे बिछाकर गंगा की लहरों के बीच संगीत की महफिलें सजाने वाले बनारस के जलोत्सव को विश्व धरोहर की सूची में शामिल कराने की पहल एक बार फिर शुरू हो गई है।
बुढ़वा मंगल को यूनेस्को की इस सूची में शामिल कराने के लिए संस्कृति विभाग तीसरी बार दस्तावेजीकरण करा रहा है। इस संगीत मेले के अनूठेपन का वर्णन जेम्स प्रिंसेप से लेकर भारत के वायसराय रहे डफरिन की पत्नी ने भी किया है।
डॉ. मोतीचंद्र की पुस्तक काशी का इतिहास के मुताबिक 1735 में काशी नरेश के सिपहसालार मीर रुस्तम अली ने बुढ़वा मंगल का आयोजन किया था। बनारस गजेटियर के अनुसार नवाब आसफुद्दौला के पुत्र वजीर अली ने बुढ़वा मंगल की शुरुआत की थी।
बुढ़वा मंगल के स्वरूप पर विदेशी पर्यटकों और कई इतिहासकारों ने खूब रोशनी डाली है। कहा जाता है कि तीन सौ वर्ष पहले बुढ़वा मंगल पर रात भर सैकड़ों नावों पर नृत्य होता था। हलवाइयों की नावों पर पूड़ी-कचौड़ी छनती थी। शान-शौकत वाले इस मेले में नावों के झूमड़ एक-एक कर गुंथे होते थे।
विवाद होने पर नावों की लहासी काट दी जाती थी। प्रो. राजेश्वर आचार्य बताते हैं कि राजा ईश्वरीनारायण सिंह के जमाने में बुढ़वा मंगल में मोरपंखी और घुड़दौड़ वाली नावें आती थीं। बजड़ों पर फूलों की क्यारियां जैसी बन जाती थीं। बजड़ों को पटैला कहा जाता था।
संस्कृति विभाग ने शुरू कराया दस्तावेजीकरण, यूनेस्को को फिर भेजेंगे प्रस्ताव
budhwa mangal
- फोटो : अमर उजाला
हिंदू-मुसलमान सभी इस मेले से पहले परंपरागत पोशाकें और पगड़ी पहन कर न्योता देते थे। एक तरफ संगीत रसिकों की भीड़ इत्र की खुशबू के बीच नृत्य-संगीत का आनंद लेती थी।
दूसरी ओर घाटों पर दीपमाला सजती थी। तब सरस्वती बाई, विद्याधरी, हुस्ना बाई, बड़ी मोती, राजेश्वरी बाई, तौखी, मैना बाई, छोटी मोती जैसी गर्वीली-गलेबाज गायिकाएं ध्रुपद, धमार, मालकौस, मल्हार, बहार, बिहाग के रागों पर चैत के नवरंग को और चटख बना देती थीं।
क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र के प्रमुख डॉ. रत्नेश वर्मा ने कहा कि बुढ़वा मंगल को विश्व धरोहर की अमूर्त सूची में जगह दिलाने के लिए करीब तीन सौ वर्ष पुराने जलोत्सव की तस्वीरों के अलावा संगीत की महफिलों से जुड़े अन्य रिकार्ड जुटाए जा रहे हैं।
जिला सांस्कृतिक समिति बुढ़वा मंगल के सदस्य अमिताभ भट्टाचार्य ने कहा कि मंगल फागुन की विदाई के बाद नव वर्ष के आगमन का वृद्ध अंगारक पर्व है। काशी को यह राजपूत-मुगल युग की महफिली संस्कृति के साथ-साथ कौमी एकता की अद्भुत मिसाल है।
अब तक ये हुए शामिल
- यूनेस्को के सिटी क्त्रिस्एटिव नेटवर्क में बनारस का संगीत
- रामलीला, वेदमंत्र पाठ की हस्त संकेत शैली