गंगा की सुरम्य लहरों के बीच सुर-लय-ताल के संगम पर गुलाब की पंखुड़ियां बरसीं। केवड़ा, इत्र की फुहारों के बीच होरी, चैती, ठुमरी की बंदिशों की खुशबू में लोग जमकर भीगे। अस्सी घाट के सामने गंगा की धारा पर हिचकोले खाती बनारस की संगीत परंपरा को संजोए बुढ़वा मंगल की महफिल का नजारा मंगलवार की रात कुछ ऐसा ही था।
नाव-बजड़े शाम छह बजे तक घाट के सामने घेरा बनाकर सजा दिए गए। किसी नाव पर मलाईदार ठंडई तो किसी पर मघई पान सजाया गया। एक-दूसरे को गुलाबी दुपट्टा और दुपलिया टोपी पहनाते, हथेलियों पर इत्र लगाते लोग महफिल में पहुंच रहे थे।
घरों से ठसक अंदाज में सजधज कर निकले। महिलाएं गुलाबी साड़ी में तो पुरुष सफेद कुरता-पायजामा में।
चंदन-टीका लगाकर लोगों की अगवानी की जा रही थी। इसी के साथ काशी की उप शास्त्रीय संगीत परंपरा को आगे बढ़ाया गया। शुरुआत हुई बनारस घराने के कलाकार संजीव शंकर और अश्विनी शंकर की शहनाई पर जुगलबंदी से।
उन्होंने राग विहाग में आलाप के बाद मध्य लय तीन ताल में और फिर द्रुत तीन ताल में बंदिश बजाई। इसके बाद बनारस घराने की होरी- यमुना तट श्याम खेलत होरी.. और ब्रज मंदिर देश दिखाए रसिया पर बेजोड़ धुन बजाई। तबले पर संगत पंडित कुबेर मिश्र ने की।