बीएचयू के विभिन्न विभागों में शिक्षा ग्रहण कर रहे दृष्टिहीन छात्रों का एक प्रयास किसी नजीर से कम नहीं है। ये पढ़ाई के अलावा चार से छह घंटे इसलिए पसीना बहाते हैं ताकि उनके जैसे पढ़ सकें और अपने पैरों पर खड़े हो सकें। सुबह चार बजे से मोमबत्ती, अगरबत्ती, डोर मैट जैसे आइटम बनाते हैं और इसकी बिक्री का पैसा दृष्टिहीनों के काम आती है।
दृष्टिहीनों के जीवन में उजाला भरने का काम छात्र रवि ने शुरू किया। दुर्गाकुंड हनुमान प्रसाद पोद्दार अंध विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने के दौरान रवि ने कई काम सीखे। जब बीएचयू के सोशल साइंस विभाग में दाखिला लिया तो कुछ और दृष्टिहीन छात्रों से अपने विचार बताए। सभी ने साथ देने का वादा किया। इसके बाद पुराने अंध विद्यालय में कुटिर उद्योग से जुड़े सामान इकट्ठा होना शुरू हो गए। रवि जैसे 40 से ज्यादा छात्र भदैनी के पुराने अंध विद्यालय में काम करते हैं।
इनके काम को देख कतई नहीं लगता कि ये देख नहीं सकते। इनसे होने वाली आय से हेल्पिंग हेल्थ यूथ कमेटी सहित कई ऐसी संस्थाओं की आर्थिक मदद करते हैं जो दृष्टि बाधित बच्चों की पढ़ाई, आर्थिक मदद करते हैं। सोशल साइंस तृतीय वर्ष के छात्र अभय कुमार शर्मा ने कहा कि वे नहीं चाहते कि उन जैसे को समाज पर बोझ बनना पड़े। सेकेंड ईयर के छात्र सत्य प्रकाश ने बताया कि हम न केवल सामान बनाते हैं, बल्कि बेचने की जिम्मेदारी भी उठाते हैं। यहां काम करने वाले छात्र सोनू भारती, मनोज कुमार ने बताया कि बच्चों को स्किल्ड के लिए ट्रेनिंग भी दी जाती है। जिन संस्थाओं को आर्थिक मदद मिलती है, उन संस्थाओं के कामेश्वर मिश्रा और सौरभ वर्मा ने बताया कि वे लोग हर साल 30 से 40 दृष्टिहीन बच्चों की मदद करते हैं। कई बच्चों को संस्था के माध्यम से स्कॉलरशिप भी दिलाई जाती है।