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यह मां का ही प्यार है जो आज मैं छन्नू हूं

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वाराणसी। पद्मविभूषण पं. छन्नूलाल ने कहा कि परिवार बड़ा होने के कारण आधी रोटी और इमली की चटनी खाकर दिन गुजारा करते थे। वास्तविक नाम तो मेरा मोहनलाल मिश्र है लेकिन मां ने छन्नू नाम इसलिए रखा कि खराब नाम रखने से बच्चे की उम्र बढ़ती है। यह मां का प्यार था जो आज मैं छन्नू लाल हूं। पद्मविभूषण पं. छन्नू लाल शनिवार को भाजपा की ओर से आयोजित फेसबुक लाइव कार्यक्रम पद्मसभा में आयोजित अभिव्यक्ति के तहत अपनी जिंदगी की कहानियों को साझा कर रहे थे।
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15 अगस्त 1936 को हरिहरपुर में जन्मे पं. छन्नूलाल बचपन की यादों को दोहराते हुए बताया कि पांच साल की उम्र में पिताजी ने सरगम सिखानी शुरू कर दी। नौ साल की उम्र में पिताजी मुजफ्फरपुर के प्रसिद्ध गायक अब्दुल गनी खां साहब के पास ले गए और गंडाबंधन हुआ। उन्होंने कहा कि संगीत का उद्देश्य ईश्वर की प्राप्ति है लेकिन आज तो सिर्फ धन कमाना है। पंडित जी ने बताया कि 27वें वर्ष में शादी होने के बाद 28वें वर्ष में वाराणसी आना हुआ और एक बार यहां आने के बाद फि र कहीं जाने का मन नहीं करता है।
भगीरथ जालान ने पूछा कि कोरोना संकट काल में समय कैसे बीत रहा है तो उन्होंने कहा कि घर पर रहकर नई-नई रचनाएं बनाई हैं। इसमें से उन्होंने सुनाया गंदगी तो करो ना, कोरोना से डरो ना। पं. मिश्र ने कहा कि कोरोना योद्धाओं को जितना धन्यवाद दिया जाए कम है। उन्होंने अमिताभ बच्चन और आमिर खान के साथ बिताए हुए पलों को भी साझा किया। सेना के शहीद जवानों को समर्पित रचना ऐ हवा मजारों पर उनके रुककर जाना, झुककर जाना... सुनाकर श्रद्धांजलि भी अर्पित की। तबले पर कृष्णा उपाध्याय और हारमोनियम पर अमन जैन ने संगत की। इस दौरान वैभव कपूर, रोहित कपूर, नवरतन राठी, संतोष सोलापुरकर एवं विजय गुप्ता मौजूद रहे।
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