अपने नाती और नतिनियों के साथ बिस्मिल्लाह खान।
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बनारस की कजरी में वह जीते थे
डॉ. सोमा घोष ने बताया कि उस्ताद का सबसे पसंदीदा राग यमन और विहाग था। राष्ट्रपति भवन में हम लोगों ने राग विहाग में ही युगलबंदी की थी। वह बनारस की कजरी में जीते थे। चाहे बारिश हो या न हो, वह कहीं भी कार्यक्रम में जाते थे तो कहते थे कि मैं कजरी जरूर बजाऊंगा। खान साहब के साथ तीन दिन हम लोग राष्ट्रपति भवन में थे। उसके तीन चार महीने बाद उनका इंतकाल हो गया।
संगत के दौरान बेटे को बैठा देते थे पीछे
अब्बा हमेशा कहते थे कि उन्होंने तो महादेव को साक्षात देखा है। एक नहीं तीन-तीन बार। उन्होंने जब यह बात अपने मामू को बताई तो उन्होंने उनसे कहा था कि यह बात किसी से मत कहना। उस्ताद ने बताया था कि अंतिम बार जब उन्होंने महादेव को देखा तो उन्होंने उनसे कहा था कि मैं तो दाने-दाने को मोहताज हूं। इसके बाद आवाज आई कि जाओ कल से मत आना।
इसके बाद जो बिस्मिल्लाह निकले तो फिर पूरी दुनिया ने उनके संगीत की तासीर को महसूस किया। एक साधारण सा इंसान और उसने शहनाई को कहां से कहां पहुंचा दिया। जब वह मेरे साथ संगत करते थे तो अपने बेटे को पीछे बैठा देते थे। रिहर्सल होता था तो मुझे अपने पास बिठाते और अपने बेटे को जमीन पर।
विश्व विख्यात शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान।
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जमीन पर बैठकर भी बजा लेंगे
संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने कहा कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का कोई जवाब नहीं था। उन्होंने संकटमोचन संगीत समारोह में प्रस्तुति देने के लिए मेरे दादा पं. अमरनाथ मिश्र से निवेदन किया था। उस्ताद ने कहा था कि वह जमीन पर कहीं भी बैठकर बजा लेंगे। उस दौर में संकट मोचन संगीत समारोह में मुसलमानों का प्रवेश नहीं था तो उन्होंने मना कर दिया। हालांकि बाद में उनके पोते ने संकटमोचन संगीत समारोह में शहनाई वादन किया था।
फुटबॉल ने दी शहनाई के लिए दमकशी
नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने बताया कि शहनाई दमकशी का साज है। बिना दम के इसे नहीं बजाया जा सकता है। उस्ताद तो शहनाई वादक के साथ ही बहुत अच्छे फुटबॉलर भी थे। यही कारण था कि शहनाई के लिए सांसों का दम उनको खेल से मिला। शहनाई बजाने के लिए जिस साधना की जरूरत होती है उसे उन्होंने रोजे से हासिल की।
कभी बालाजी मंदिर की मढ़ी तो कभी बड़ा गणेश की चौखट पर शहनाई बजाने वाले उस्ताद ने लाल किले की प्राचीर से भी देश को अपनी शहनाई की धुन सुनाई थी। पांच वक्त के नमाजी भारत रत्न बिस्मिल्लाह खां की सादगी का अंदाज ऐसा था कि वह बधाई बजाने के लिए चबूतरे पर भी बैठ जाते थे तो कहीं कबीरचौरा अस्पताल की जमीन पर।