उन्होंने बताया कि सिगरा के कस्तूरबा नगर स्थित मेरे ही मकान से गुरुजी की अस्थि कलश अस्सी घाट पर गई थी। यहां सनातन परंपरानुसार विसर्जन किया गया था। बिरजू महाराज ने लखनऊ घराने के कथक को विश्व पटल पर पहुंचाया, लेकिन बनारस की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक भूमि हमेशा से ही शास्त्रीय कलाओं का केंद्र रही है और उनके लिए यह भूमि भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी, जितनी कि उनकी अपनी विरासत।
हम अपनी अकादमी और गुरुजी के सैकड़ों शिष्यों की तरफ से सरकार से यह मांग करेंगे कि काशी में पंडित बिरजू महाराज की एक आदमकद स्टैच्यू लगाने की मांग करेंगे। वर्षों से काशी संगीत और संगीत का घराना रहा है। यहां पर गुरुजी की प्रतिमा कथक कर रहे तमाम युवाओं को अनोखा संदेश देगी।
युवा कलाकार आशीष सिंह ने कहा कि कथक को वैश्विक पहचान दिलाने वाले पंडित बिरजू महाराज ने न केवल मंच पर अपनी अद्भुत प्रस्तुतियों से लोगों को मंत्रमुग्ध किया, बल्कि कथक सीखने वाले युवाओं को एक अनोखी कला और जीवन दृष्टि भी दी। उनकी शिक्षाएं केवल नृत्य तक सीमित नहीं थीं, बल्कि भाव, लय, अनुशासन और भारतीय संस्कृति की गहरी समझ से जुड़ी थीं।
पंडित बिरजू महाराज का मानना था कि कथक सिर्फ पैरों की थाप नहीं, बल्कि आत्मा की अभिव्यक्ति है। सांस्कृतिक शहर काशी में उन्होंने कथक से जुड़े कई युवाओं को प्रेरित किया। उनके मार्गदर्शन में प्रशिक्षित कलाकार आज देश-विदेश में कथक की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। गुरु-शिष्य परंपरा को उन्होंने आधुनिक समय में भी जीवंत बनाए रखा, जो आज के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।
कथक डांसर शालिनी चाैरसिया का कहना है कि पंडित बिरजू महाराज का काशी से गहरा और भावनात्मक जुड़ाव रहा है। ऐसे में उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए काशी में उनकी प्रतिमा (स्टैचू) स्थापित की जानी चाहिए। इससे आने वाली पीढ़ियों को कथक और भारतीय शास्त्रीय नृत्य की महान परंपरा के बारे में जानने-समझने का अवसर मिलेगा।
स्थानीय कलाकारों का मानना है कि यदि काशी में पंडित बिरजू महाराज की प्रतिमा स्थापित होती है, तो यह न केवल उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी, बल्कि कथक सीखने वाले युवाओं के लिए प्रेरणा का केंद्र भी बनेगी। इससे काशी की सांस्कृतिक पहचान और अधिक सशक्त होगी।