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बड़ा सवाल ! भारत के कण-कण में समाए श्रीराम की क्यों कम ही बिकती हैं मूर्तियां

Thu, 30 Jan 2020 12:26 AM IST
स्‍वाधीन तिवारी रमेश कुड़ियाल, अमर उजाला, वाराणसी
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला
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बनारस का चांदपुर चौराहा। इलाहाबाद मार्ग की ओर बढ़ने पर पत्थरों की मूर्तियां बनाते कारीगर और महिलाएं भी नजर आती हैं तो बरबस कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता ‘वह तोड़ती पत्थर मैंने देखा उसे इलाहाबाद के पथ पर’ जेहन में उभर आती है। कविता के पात्रों से मिलने की, उनके जीवन के साक्षात्कार का मन करता है तो उस मूर्ति बाजार की ओर कदम बढ़ाता हूं।

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जहां-तहां बनी और अधबनी मूर्तियां बिखरी हुई हैं। कहीं गणेश, कहीं शिव, कहीं दुर्गा, कहीं काली, कहीं हनुमान, कहीं भीमराव आंबेडकर और कहीं गांधी। इन मूर्तियों के बीच श्रीराम की मूर्ति नजर नहीं आती। पूछने पर छेनी हथौड़े से अनगढ़ पत्थर को किसी देवमूर्ति को आकार देने वाले बनारसी का ध्यान टूटता है। वह खड़ा होता है और ग्राहक समझकर पूछता है, बाबू जी कौन सी मूर्ति दिखाऊं।

श्रीराम की मूर्ति की मांग करने पर कहता है कि बाबू जी श्रीराम की मूर्ति कम ही बिकती हैं। लेकिन आप कहें तो हम बनाकर दे सकते हैं। हफ्ते भर में तैयार हो जाएगी। श्री राम की मूर्ति कम बिकने के सवाल का उसके पास भी कोई जवाब नहीं होता। हालांकि वह कहता है कि शायद अयोध्या में मंदिर बनने के बाद श्रीराम की मूर्ति की मांग बढ़े। बनारसी से बात शुरू होती है। कहता है कि बाबू जी हमारे दादा-परदादा से यह काम करते आ रहे हैं। सबसे ज्यादा तो गणेश, महादेव और हनुमान की मूर्ति की ही डिमांड है। उसके बाद दुर्गा की मूर्तियां बिकती हैं। ज्यादातर मूर्ति किसी खास त्योहार पर ही ज्यादा बिकती है। उसे मूर्तियों के निर्माण से अलग हटकर जब पढ़ाई-लिखाई पर बात की तो कहता है कि उसे बस अक्षर ज्ञान ही है।
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हां बच्चों को पढ़ाने की कोशिश की, लेकिन पैसे के अभाव में उन्हें ज्यादा नहीं पढ़ा सके। वैसे भी पढ़ाकर क्या करना है। कहीं नौकरी तो है नहीं। बस मूर्ति बनाने का यही हुनर सिखा रहा हूं। सीख गए तो अपना पेट भर सकेंगे। हालांकि वह यह भी कहता है कि मूर्तियां अब ज्यादा नहीं बिकती हैं। ऐसे में सिलबट्टे बनाते हैं तो दो जून की रोटी का जुगाड़ हो जाता है। बनारसी के खिचड़ी बाल उसके अनुभव को बयां करते हैं। वह कल्पनाओं में नहीं जीता। हकीकत को गहरे से समझता है। यही वजह है कि वह अपने बच्चों को पढ़ाने के बजाय इसी पैतृक हुनर को सिखाता है।
 

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : amar ujala

अब थोडा आगे बढ़ा तो मुन्ना लाल और अशोक कुमार से मुलाकात होती है। वह भी सड़क से गुजरते वाहनों के के शोरगुल से बेपरवाह पत्थरों को तराशते हुए दिखते हैं। वह भी बनारसी की बात को दोहराते हैं। कहते हैं श्रीराम की मूर्ति की मांग बहुत कम है। वह भी इसके पीछे की वजह नहीं बता पाते। कहते हैं कि सबसे ज्यादा तो आंबेडकर की मूर्तियां बिकती हैं। हालांकि वह आंबेडकर के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं रखते। कहते हैं कि हमें इस बात से क्या मतलब कि कौन क्या है। हां, कोई मूर्ति बिकती है तो उन्हें दो पैसे मिल जाते हैं। यही संतोष की बात है। उन्होंने किसी से यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि आंबेडकर कौन हैं और उनकी मूर्ति कोई क्यों खरीद रहा है। कहते हैं कि कोई बड़ा नेता है बाबू जी। हां गांधी के बारे में वह जरूर जानते हैं। कहते हैं कि गांधी बाबा की मूर्ति भी ठीक-ठाक बिकती है।

इसी क्रम में तूफानी लाल शर्मा, मुन्ने आदि से भी मुलाकात होती है। देव मूर्तियों को आकार देने वाले उन मूर्तिकारों के जीवन की स्याह सच्चाई यह भी है कि उनके पास अपनी कोई जमीन नहीं है। जिस जमीन पर वह मूर्तियों को आकार देते हैं, वह लोक निर्माण विभाग की है। कहते हैं कि कई बार उन्हें वहां से हटने का नोटिस दिया जा चुका है। वह सरकार से जगह आवंटित करने के लिए करीब दस वर्षों से लड़ रहे हैं। कहते हैं कि सरकार ने उन्हें लोहता से आगे जमीन देने का प्रस्ताव रखा गया है, लेकिन वह दस-बारह फीट जगह उनके काम के हिसाब से कम है। साथ ही वह इतनी दूर है कि वहां उनका कारोबार चल नहीं सकता। अगर सरकार चांदपुर चौराहे की मौजूदा जगह को ही उन्हें आवंटित करे तो उनका जीवन सार्थक हो जाए। कहते हैं वैसे भी इस जगह पर उनके दादा-परदादा भी काम करते आ रहे हैं। उनके बाप -दादा भी इसी जगह जन्मे और यहीं पर मर गए। उनका जन्म भी इसी स्थान पर हुआ।

सभी मूर्तिकार बड़ा सवाल उठाते हुए कहते हैं बाबू जी हम मूर्तियां बनाकर हिंदू आस्था को और मजबूत कर रहे हैं। ऐसे में क्या हिंदूवादी सरकार को हमें प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। वह मुख्यमंत्री की ओर से कुम्हारों के लिए आर्थिक मदद की योजना से भी अनजान हैं। जब उन्हें इस बारे में बताया तो कहते हैं कि मौजूदा समय में वह मिर्जापुर के अहरौला और चुनार से पत्थर मंगाते हैं, लेकिन बाजार में मारबल से बनी मूर्तियों की मांग ज्यादा है। सरकार मदद करे तो वह भी कुछ आधुनिक यंत्रों के साथ मार्बल की मूर्तियां बना सकते हैं। ऐसा होने पर उनकी जिंदगी में भी नया वसंत आ सकता है।

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