मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित पूर्व सांसद और जीएनएसयू बिहार के कुलाधिपति गोपाल नारायण सिंह ने “आदिपुरुष” की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समस्त ज्ञान का मूल स्रोत वही है। उन्होंने कहा कि शब्द की उत्पत्ति भगवान शिव के डमरू से मानी जाती है, जो भारतीय दर्शन की गहराई को दर्शाता है।
जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रो. हीरामन तिवारी ने ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली’ के स्थान पर ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ शब्द को अधिक उपयुक्त बताया। वहीं, सामाजिक विज्ञान संकाय के प्रमुख प्रो. अशोक उपाध्याय ने कहा कि अतीत की त्रुटियों का विश्लेषण कर उन्हें सुधारने के उपाय खोजने की आवश्यकता है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. बालमुकुंद पांडेय, जो अखिल भारतीय इतिहास संकलन समिति के संगठन सचिव भी हैं, ने कहा कि वर्तमान समय में भारत की ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवन मिल रहा है। प्रो. ए. गंगाथरन ने भी भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनरुद्धार पर बल दिया।
सम्मेलन की शुरुआत इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. घनश्याम के स्वागत भाषण से हुई, जबकि डॉ. राम प्रकाश ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। यह तीन दिवसीय सम्मेलन विभिन्न सत्रों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों पर गहन चर्चा का मंच प्रदान करेगा।