वाराणसी। तमिलनाडु की पहाड़ी टोडा कढ़ाई की कला को बाजार से जोड़ने और कारीगरों को आर्थिक संपन्न बनाने के लिए काशी से शोध कार्य शुरू हो चुका है। नीलगिरी पर्वत जाकर बीएचयू की टीम टोडा जनजातियों की इस कला और उनकी आजीविका को मजबूत करेगी। कला संकाय के दो प्रोफेसरों डॉ. आरएस मिश्रा और डॉ. विनायक कुमार दुबे की ओर से किया जा रहा यह रिसर्च टोडा कला के कारीगरों की चुनौतियों को सामने लाएगा।
वहीं इस पुरातन परंपरा को बाजार से जोड़कर नीतिगत हस्तक्षेपों के माध्यम से बड़े स्तर से संरक्षित और टिकाऊ बनाया जाएगा। सस्टेनिंग टोडा एम्ब्रॉयडरीः कल्चरल हेरिटेज, मार्केट एक्सपैंशन एंड पॉलिसी इंटरवेंशंस नाम से इस प्रोजेक्ट को शुरू किया गया है जिसे इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल Science रिसर्च के स्पेशल कॉल फॉर प्रोजेक्ट विकसित भारत 2047 के अंतर्गत संचालित किया जा रहा है। दो वर्ष तक चलने वाली इस परियोजना को 16 लाख रुपये दिए गए हैं।
239 टोडा कारीगर अध्ययन के लिए चिह्नित
प्रोजेक्ट के समन्वयक और परियोजना अन्वेषक कला संकाय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रत्न शंकर मिश्रा हैं। वहीं शारीरिक शिक्षा विभाग के डॉ. विनायक कुमार दुबे इसके सह-अन्वेषक हैं। अध्ययन में मिश्रित शोध पद्धति के तहत 239 टोडा कारीगरों को अध्ययन के लिए चिह्नित किया गया। नीलगिरि जिले के उधगमंडलम, कोटागिरी और कूनूर क्षेत्र के लोग हैं। डॉ. मिश्रा ने बताया कि यह कला बेहतर आय दिलाने में सक्षम है। कहा कि स्थानीय तौर पर ‘पुखूर’ कहा जाता है। ये लोग तमिलनाडु की नीलगिरि की पहाड़ियों में निवास करती है। ज्यामितीय डिजाइनों और पारंपरिक सिलाई तकनीक के लिए इन्हें जाना जाता है। जीआई मान्यता प्राप्त होने के बावजूद टोडा कढ़ाई कला से जुड़े कारीगरों को कम आय, सीमित बाजार पहुंच, कच्चे माल की बढ़ती लागत, नकली उत्पादों और युवा पीढ़ी की घटती भागीदारी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।