बेशक समय विज्ञान और तकनीक का है लेकिन खेती-किसानी की फसल बीएचयू की जमीन पर भी खूब लहलहा रही है। महामना ने बीएचयू और कृषि महाविद्यालय का सपना एक साथ देखा था। सोच स्पष्ट थी, जिस देश की 75 फीसदी आबादी खेती करती हो, वहां कृषि को नजरअंदाज किया ही नहीं जा सकता। ये उनकी सोच, संकल्प और मेहनत का ही नतीजा है कि आज दुनिया भर में जिस ऊंचाई पर बीएचयू का नाम है, ठीक उसी तरह यहां स्थापित कृषि विज्ञान संस्थान द्वारा विकसित धान, गेहूं समेत सब्जियों की प्रजातियां भी विदेशों में लहलहा रही हैं।
दो संकाय और 11 विभागों वाले बीएचयू का कृषि विज्ञान संस्थान आज जिन उपलब्धियों के साथ खड़ा है उसका भी गौरवशाली इतिहास है। ‘हिस्ट्री ऑफ बीएचयू’ के अनुसार 1904 में महामना ने कहा था ‘जिस देश की दो तिहाई जनसंख्या किसानी पर आश्रित है, उसके लिए महाविद्यालय की स्थापना के महत्व का वर्णन करना उचित नहीं।’ अपनी परिकल्पना को उन्होंने साकार किया। 1920 में उन्होंने 500 एकड़ का फार्म खेती के लिए चुना। इस फार्म में अमेरिकन कपास, लंबे अरहर, जौनपुरी मक्का, अफगानी चना, जापानी मटर और देशी ज्वार की खेती शुरू कराई।
धन की कमी की वजह से महाविद्यालय उस वक्त शुरू नहीं हो सका। महामना ने इसके लिए जोधपुर के महाराजा सर उम्मेद सिंह से दान मांगा। उनसे मिले चार लाख रुपये के दान से कृषि महाविद्यालय का भवन और हॉस्टल बना। 1931 में कृषि अनुसंधान केंद्र की नींव रखी गई। शुरुआत एमएससी की पढ़ाई और शोध से हुई। इसके बाद 1945 में ये कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर बना। 1958 से यहां बीएससी की पढ़ाई शुरू हुई। इसके बाद 1968 में संकाय और 1981 में इसे संस्थान का दर्जा मिला। आज संस्थान अपना वार्षिक समारोह मना रहा है। वर्तमान में मुख्य परिसर में 160 एकड़ का कृषि फार्म है। 400 गायों का डेयरी फार्म और हार्टिकल्चर फार्म भी है।