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BHU: इसरो के पूर्व प्रमुख ने कहा- भारत ने सैन्य जरूरतों के लिए नहीं किया स्पेस टेक्नोलॅाजी-सैटेलाइट का उपयोग

Sun, 01 Feb 2026 01:35 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: काशी हिंदू विश्वविद्यालय विज्ञान संस्थान स्थित महामना सेमिनार कॉम्पलेक्स सभागार में विज्ञान गंगा के 13वें अंक का भी लोकार्पण समारोह किया गया। इसमें इसरो के पूर्व प्रमुख एएस किरण कुमार ने छात्रों को संबोधित किया।
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लोकार्पण करते अतिथिगण। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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बीएचयू में अचिंत्य पत्रिका के आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) विशेषांक का लोकार्पण करने पहुंचे इसरो के पूर्व प्रमुख एएस किरण कुमार ने कहा, हमें दूसरों की गलतियों से भी सीखना चाहिए। यही इसरो का मूल मंत्र है। वहीं, भारत ने बाकी दुनिया की तरह से अपने स्पेस टेक्नोलॉजी और सैटेलाइट का इस्तेमाल सैन्य जरूरतों के लिए नहीं किया। उन्होंने कहा कि आज अनपढ़ मछुआरे भी सैटेलाइट नेविगेशन से मछलियां पकड़ रहे हैं। 

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मुख्य अतिथि पद्मश्री से सम्मानित एएस किरण कुमार ने विक्रम साराभाई के योगदानों को गिनाया। किरण कुमार ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद रूस-अमेरिका के बीच अंतरिक्ष दौड़ शुरू हुई। रूस आगे निकल गया तो अमेरिका ने उसे पीछे करने की रणनीति बनाई। ठीक उसी समय भारत की स्वतंत्रता के महज 10 वर्ष ही हुए थे तब आए विक्रम साराभाई ने भारत को प्रौद्योगिकी से जोड़ा और स्पेस टेक्नोलॉजी में स्थापित किया।

कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि बीएचयू और इसरो, दोनों ही देश का गौरव हैं। इसरो ने देश में एक नए प्रकार के स्वाधीनता संग्राम की भावना को जन्म दिया है, जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से आत्मनिर्भरता की ओर आगे बढ़ रहा है। अचिंत्य का यह संस्करण अत्यंत सराहनीय कार्य का परिणाम है। उन्होंने सुझाव दिया कि इसमें पॉडकास्ट को भी शामिल किया जाना चाहिए। विज्ञान संकाय संकाय प्रमुख प्रो. राजेश कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि संकाय के शोधकर्ता स्पेस मिशन पर कार्य कर देश की प्रगति में योगदान दे रहे हैं। संचालन छात्रा दीपांशी अग्रवाल ने किया।

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1999 में सैटेलाइट से मछलियों का पता लगाया: एएस किरण कुमार ने बताया कि जियोस्टेशनरी सैटैलाइट को लॉन्च करने के बाद नासा के सहयोग से मात्र एक वर्ष में 2400 गांवों में सैटेलाइट ब्रॉडकास्टिंग सेवा शुरू की गई। इसरो की देन है कि यहां से दिल्ली वालों की बातें लाइन देख सुन पाते हैं। इसरो ने 1999 में सैटेलाइट से मछुआरों को बताया कि किस जगह पर ज्यादा मछलियां मिलेंगी। 

2019 की असफलता से लिया सबक
2008 में चंद्रयान-1 ने चंद्रमा पर पानी खोजा। चंद्रयान-2 में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव (जहां कोई नहीं उतरा था) पर लैंडिंग का लक्ष्य रखा गया, जिसके लिए पूर्ण स्वदेशी नया इंजन विकसित किया गया। 2019 की असफलता से सबक लेकर 2023 में चंद्रयान-3 ने सफल सॉफ्ट लैंडिंग की और तब पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही थी। मंगल मिशन (मंगलयान) और आदित्य-एल1 (सूर्य किरणों का अध्ययन) की सफलताएं भी साथ में रहीं।
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