बीएचयू के लिए महामना ने काशी नाप डाली थी। जहां भी जगह सुनी, गंगा किनारा देखा, वहीं मन में इमारत खड़ी करते और खुद ही ढहा देते। गंगा का किनारा उनके मन में बसा था और आखिरकार उनकी तलाश पूरी हुई नगवां में। वहीं बीएचयू की स्थापना का निर्णय लिया गया लेकिन ऐन वक्त पर भूमिपूजन व स्थापना के बाद जगह बदलनी पड़ी। गंगा की उफनाती लहरों और बाढ़ की वजह से स्थापना स्थल से करीब 500 मीटर दूर विश्वविद्यालय ने आकार लेना शुरू किया। फिलहाल आज स्थापना स्थल पर विशाल ट्रामा सेंटर खड़ा है और दो बार उसे बाढ़ की मार झेलनी भी पड़ी है। एक बार 2013 में और मौजूदा वक्त भी।
महामना के मन-मस्तिष्क में बीएचयू अपनी संपूर्णता से आकार ले चुका था। शिक्षा सदस्य सर हरकोर्ट बटलर ने 02 जून 1913 को बीएचयू को मंजूरी दी थी लेकिन पांच शर्तों के साथ। इसमें पहली शर्त थी, विश्वविद्यालय वहां बने जहां विकास का पूरा अवसर हो और शिक्षा का सही माहौल। कई जगह देखी गई लेकिन महामना अपनी बगिया मां गंगा के सानिध्य में बसाना चाहते थे। पहले राजघाट में बीएचयू के निर्माण का प्रस्ताव बना। वहां गंगा का किनारा तो था लेकिन कछार होने और बलुई मिट्टी के चलते उसे छोड़ना पड़ा। शिवपुर के हरहुआ में भी जमीन देखी गई थी। वहां सब कुछ था लेकिन शहर से दूरी मालवीय जी को खटक रही थी। सेंट्रल हिंदू कॉलेज कमच्छा में भी बीएचयू की स्थापना पर विचार हुआ। ये जगह बीच शहर में थी लेकिन यहां विस्तार के लिए जगह नहीं थी। बुद्ध की भूमि सारनाथ जहां ज्ञान पूरे वेग से बहता है, उसे भी देखा गया। सब ठीक था पर गंगा का किनारा दूर था।
‘हिस्ट्री ऑफ बीएचयू’ में जिक्र है कि जिस वक्त विश्वविद्यालय के लिए जगह देखी जा रही थी, महामना ने स्वयं कहा था ‘वो दृश्य अलौकिक होगा जब मां गंगा के किनारे खड़े होकर दस हजार छात्र वंदना करेंगे।’ यही वजह थी कि उन्होंने सारनाथ में बीएचयू की स्थापना नहीं की। फिर कहीं जाकर गंगा किनारे नगवां का चयन हुआ। भरी पूरी भूमि, गंगा का किनारा व शहर से नजदीक। महामना के साथ जिसने भी यह जगह देखी, सभी ने कहा कि यहां तलाश पूरी हुई।
चार फरवरी 1916 में नगवां में भूमिपूजन हुआ, लार्ड हार्डिंग्ज ने इसकी नींव रखी लेकिन जहां स्थापना की गई उस क्षेत्र को मां गंगा आलिंगनबद्ध कर लेती हैं। यह बाढ़ प्रभावित इलाका था जब ये पता चला तब वहां से करीब 500 मीटर दूर विश्वविद्यालय का निर्माण शुरू हुआ। सबसे पहले आर्ट्स कॉलेज की नींच रखी गई और इस तरह एशिया के ख्यातिलब्ध विश्वविद्यालय की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।