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जयंती विशेष: काशी की यादों के बिस्मिल्लाह...बोले थे, अमेरिका में कैसे लाएंगे बनारस के मंदिरों के घंटों की आवाज

Thu, 21 Mar 2024 09:20 AM IST
प्रगति चंद हीरालाल चौरसिया, वाराणसी।

सार

भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की 108वीं जयंती है। काशीवासियों के जहन में आज भी बिस्मिल्लाह खां की यादें समाई हैं। शहनाई के बादशाह बिस्मिल्लाह खां ने अमेरिका में रहने का ऑफर यह कहकर ठुकरा दिया था कि अमेरिका में कैसे लाएंगे बनारस के मंदिरों के घंटों की आवाज और गंगा। आइए जानते हैं उनसे जुड़ी रोचक कहानी...
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उस्ताद बिस्मिल्लाह खां - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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शहनाई के बादशाह भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने बनारस को जीया है। गंगा जमुनी तहसीब को समेट कर जिंदगी को एकाकार किया। जो शहनाई मांगलिक कार्यक्रमों तक सिमटी थी, उसे दुनिया के फलक पर पहुंचाया। ऐसे शख्सियत की जिंदगी की पहलुओं को बिस्मिल्लाह खां एंड बनारस: द साइट ऑफ बनारस पुस्तक में कलमबद्ध करने वाली संगीतकार, गायिका और लेखिका पद्मश्री प्रो. रीता गांगुली ने उस्ताद से जुड़े पांच किस्से सुनाए।

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क्या लाएंगे बनारस के मंदिरों के घंटों की आवाज और गंगा
जब अमेरिका उस्ताद की शहनाई का मुरीद हो गया तब वहां के एंबेसडर ने उस्ताद को अमेरिका में रहने की पेशकश की। अमेरिका में ही हर वो चीज देने को कहा, जो बिस्मिल्लाह खां चाहते थे। तब उस्ताद ने कहा था कि क्या आप बनारस के मंदिरों के घंटों की आवाज और अविरल प्रवाहित होती गंगा की धारा को ला सकते हैं। तब एंबेसडर ने कहा कि दिस इज नॉट पॉसिबल...। और इस तरह बिस्मिल्लाह खां ने अमेरिका के आगे काशी को चुना।

दरवाजा खोल द हमके उतर के हौ...
प्रो. रीता गांगुली उस्ताद को पहली बार विदेश (इंग्लैंड के एडीनवर्ग संगीत फेस्टिवल) लेकर गईं। तब उस्ताद ने जहाज में बोला, हमके यहीं उतार द। ठीक ना लगत हौ..., दरवाजा खोल द हमके उतरे के हौ। उनके साथ प्रख्यात कलाकार उस्ताद विलायत खां, पं. केलूचरण महापात्रा आदि कलाकार भी थे।

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हमका ना चाही... इ पुरस्कार

उस्ताद को सद्भावना पुरस्कार देने के लिए प्रो. रीता गांगुली की पुस्तक से कुछ अंश राष्ट्रपति रहे डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने मांगा था। सद्भावना पुरस्कार मिलने की जानकारी जब प्रो. गांगुली ने बिस्मिल्लाह खां को दी जो उन्होंने कहा कि ई का अवार्ड हो ला, हमका ना चाही... ई पुरस्कार...। सहनाई बजावे क हौ त चलब...।

जब तपती गर्मी में वो बच्चा रह सकता है तो मैं क्यों नहीं...
प्राे. रीता गांगुली एक बार जब उस्ताद के घर पहुंचीं तो देखा बिना पंखे के ही उस्ताद बैठे हैं। उनसे पूछा- इतनी गर्मी में आप कैसे रहते हैं। तब वह मुझे छत पर लेकर गए और खिड़की खोलकर दिखाया कि एक महिला ने बांस की लकड़ी में साड़ी बांधकर अपने बच्चे को सुलाया था और वह काम कर रही थी। उस्ताद ने कहा कि जब वो बच्चा इसी गर्मी में रहकर बड़ा हो सकता है मैं क्यों नहीं रह सकता।
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कमाई का 10 फीसदी देते थे गरीबों को
उस्ताद अपनी कमाई का 10 फीसदी हिस्सा गरीबों को देते थे। वह शहनाई के बाद अपना ज्यादा वक्त इबादत में गुजारते थे। पांच वक्त की नमाज पढ़ना नहीं भूलते थे। मुहरम्म जब शुरू होता था तो दसवीं मुहर्रम तक वह कहीं नहीं जाते थे। रमजान भर इबादत में मशगूल रहते थे।

आज होगी दुआख्वानी और हनुमान चालीसा का पाठ
उस्ताद बिस्मिल्लाह खान फाउंडेशन की ओर से उस्ताद बिस्मिल्लाह की जयंती पर बृहस्पतिवार को सुबह 11:30 बजे से दरगाहे फातमान में जयंती समारोह का आयोजन किया गया है। उनके मकबरे पर गुलपोशी, कुरानख्वानी, दुआख्वानी व हनुमान चालीसा का पाठ होगा। कलाकार, जनप्रतिनिधि, नेता व अधिकारी अकीदत पेश करने पहुंचेंगे।
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