गुणवत्ता तो कुछ गिनी चुनी दुकानों ने ही बनाकर रखी हुई है। खासकर ठठेरी बाजार से जुड़ी गलियों में। यहां की कचौड़ी हो या फिर विश्वप्रसिद्ध लस्सी और मिठाइयों का स्वाद, और कहीं नहीं मिलेगा। इस बाजार की गलियां अभी बाजारवाद की भेंट नहीं चढ़ी हैं, बल्कि यहां अब भी भरोसे और गुणवत्ता के साथ समय धीरे चल रहा है।
काशी सुंदर हुई है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन हर चमक अपने साथ कुछ छाया भी लाती है। पहले लोग बैठते थे, बहस करते थे, पढ़ते थे। पान की दुकानें छोटी-छोटी यूनिवर्सिटी होती थीं। अब हर हाथ में मोबाइल है। हर दूसरा आदमी लेखक है, कवि है, विचारक है, लेकिन पढ़ने वाले कम हो गए हैं। हां, एक बदलाव हुआ है कि पहले गलियां गंदी थीं, नालियां खुली रहती थीं, भीड़ बेतरतीब थी। आज सड़कें चौड़ी हैं, घाट चमकते हैं, रात में रोशनी झिलमिलाती है। काशी बदल गई है। यह बदलाव सिर्फ सड़कों, मंदिरों और बाजारों का नहीं है। यह बदलाव शहर की आत्मा के आसपास भी हुआ है।
आज सोशल मीडिया पर महिला सशक्तीकरण की बातें होती हैं, लेकिन काशी की स्त्रियां तो सौ साल पहले ही अपने ढंग से मजबूत थीं। 1937 में महिलाओं को तैराकी सिखाने के लिए संस्था बनी। मीर घाट पर स्त्रियां गंगा में उतरती थीं। यह सिर्फ तैरना नहीं था, डर के खिलाफ अभ्यास था। यहां महिलाएं खुद लठैत बनकर खड़ी रहती थीं। काशी की स्त्रियां तब भी जागरूक थीं, जब देश का बड़ा हिस्सा पर्दे में था।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी लिखा था कि स्त्री हमेशा से प्रधान रही है। हां, आज भी सुबह-सुबह अगर आप चौखंभा की तरफ निकल जाएं...किसी गली में ताजा कचौड़ी की खुशबू मिल जाए। हलवाई के हाथ में वही पुराना पीतल का बर्तन दिख जाए। गंगा किनारे कोई बिना मोबाइल निकाले सिर्फ आरती देखता मिले। तो समझ लीजिए, काशी अब भी जिंदा है।