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बनारस की रामलीला: ढाई घंटे में होती है 14 साल की लीला, मूक अभिनय करते हैं कलाकार

Tue, 29 Sep 2020 05:15 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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डीरेका का रावण दहन। - फोटो : अमर उजाला
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काशी में रामलीलाओं के स्वरूप अलग-अलग हैं। कहीं झांकी तो कहीं लीला के स्वरूप नेमियों की आस्था को तप्त करते हैं। कुछ ऐसी ही अलग और मनभावन है डीरेका की रामलीला। ढाई दशकों से अपने अलग स्वरूप के कारण इसकी अपनी पहचान है। गागर में सागर भरने वाली लीला का नेमी हर साल बेसब्री से इंतजार करते हैं, ढाई घंटे में 14 साल की लीला देखकर दर्शक भी मंत्रमुग्ध हो उठते हैं।

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डीरेका विजया दशमी समिति के पूर्व महामंत्री एसडी सिंह ने बताया कि डीरेका के स्थापना काल से ही रामलीला का मंचन हो रहा है। समय के साथ बदलाव हुआ और दशहरे के दिन होने वाला रूपक सभी के आकर्षण का केंद्र बनता चला गया।


रामचरित मानस की चौपाइयों पर आधारित राम वन गमन से लंका तक के ढाई घंटे के रूपक को देखने के लिए आसपास के लोग साल भर इंतजार करते हैं। रूपक की शुरुआत जब जब होइहे धरम कै हानि से होती है।

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यहां रामलीला के बजाय मोनो एक्टिंग पर आधारित रूपक आकर्षण का केंद्र रहता है। यहां रूपक के पात्र संवाद नहीं बोलते हैं। मंच से संवाद बोला जाता है और उस पर पात्र मूक अभिनय करते हैं। मानस की चौपाइयों में कजरी, चैता, छप्पय और कहरवां का प्रयोग किया जाता है।

सबसे खास बात तो यह है कि डीरेका में होने वाले रूपक में भाग लेने वाले पात्र डीरेका इंटर कॉलेज के छात्र ही होते हैं। उन्हें लगभग एक महीने की कड़ी मशक्कत के बाद अभिनय के लिए तैयार किया जाता है। इसमें हिंदू और मुस्लिम समुदाय के छात्र शामिल होते हैं जो हमारे देश की गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल है।

नहीं निभाई जाएगी मंचन की परंपरा
कोरोना संक्रमण के कारण डीरेका में होने वाले रूपक के मंचन की परंपरा इस बार नहीं निभाई जाएगी लेकिन दशहरे के लिए प्रतीकात्मक पूजा की जाएगी। - एसडी सिंह, रूपक निदेशक

वर्ष भर रहता है लीला का इंतजार
डीरेका के रूपक का अलग अंदाज है, लोग वर्ष भर डीरेका की लीला का इंतजार करते हैं, इस बार कोरोना संक्रमण के कारण इसको स्थगित कर दिया गया है। - डॉ. छोटे लाल सिंह, प्रज्ञानगर
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