यहां रामलीला के बजाय मोनो एक्टिंग पर आधारित रूपक आकर्षण का केंद्र रहता है। यहां रूपक के पात्र संवाद नहीं बोलते हैं। मंच से संवाद बोला जाता है और उस पर पात्र मूक अभिनय करते हैं। मानस की चौपाइयों में कजरी, चैता, छप्पय और कहरवां का प्रयोग किया जाता है।
सबसे खास बात तो यह है कि डीरेका में होने वाले रूपक में भाग लेने वाले पात्र डीरेका इंटर कॉलेज के छात्र ही होते हैं। उन्हें लगभग एक महीने की कड़ी मशक्कत के बाद अभिनय के लिए तैयार किया जाता है। इसमें हिंदू और मुस्लिम समुदाय के छात्र शामिल होते हैं जो हमारे देश की गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल है।
नहीं निभाई जाएगी मंचन की परंपरा
कोरोना संक्रमण के कारण डीरेका में होने वाले रूपक के मंचन की परंपरा इस बार नहीं निभाई जाएगी लेकिन दशहरे के लिए प्रतीकात्मक पूजा की जाएगी। - एसडी सिंह, रूपक निदेशक
वर्ष भर रहता है लीला का इंतजार
डीरेका के रूपक का अलग अंदाज है, लोग वर्ष भर डीरेका की लीला का इंतजार करते हैं, इस बार कोरोना संक्रमण के कारण इसको स्थगित कर दिया गया है। - डॉ. छोटे लाल सिंह, प्रज्ञानगर