बनारस लिट फेस्ट में पीयूष मिश्रा
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बनारस लिट फेस्ट की आखिरी शाम और पीयूष मिश्रा के साज ने शरीर और मन दोनों को एक साथ झुमाया। शेक्सपियर की लाइनों के साथ बुंदेले-हरबोलो के फ्यूजन ने दर्शकों को अलग महसूस कराया। उनकी आवाज कानों में पड़ते ही हर कोई कल्पनाओं कहानियों में डूब गया। शुरुआत दूरदर्शन दौर के संगीत से हुई। हारमोनियम लेकर मंच पर खड़े हुए और थोड़ा नजारा चटपट बातें, यही कहानी आते जाते गाया तो लगा कि भावनाओं में डूबकर अपने दर्द को कह रहे हों। संगीतमय कहानी की तरह से हेमलेट की लाइनें पढ़ते जा रहे थे। वहीं हाथों की अंगुलियों में हरकत बनी रही।
मौशिकी के गानों पर दर्शकों की मौत चरम पर
पीयूष मिश्रा विलियम शेक्सपियर के लिखे हेमलेट को सुनाते हुए डेनमार्क के हालातों, बुंदेलों हर बोलों मुंह हमने सुनी कहानी, एक नगरी में रहते थे भई ऐसा राजा रानी के बोलों को गाने लगे। अपने संघर्ष के दिनों में रचा गीत वो सुहाने दिन, आशिकाने दिन, मौशिकी में डूबे हुए वो पुराने दिन गाया तो दर्शक की मौज और भी चरम पर पहुंच गई।
समापन आरंभ है प्रचंड गाने से किया तो हर कोई वीर रस की धुन में खोकर नृत्य करने के लिए मजबूर हो गया। पीयूष मिश्रा ने कहा कि इस प्रस्तुति तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। उन्होंने बताया कि फ्लाइट लेट होने के कारण वह देर से पहुंचे।