दरबार हॉल में साहित्य कला और समाज : बदलते संबंधों की पड़ताल की गई। प्रसिद्ध कवि और निबंधकार उदयन बाजपेयी ने शिक्षा के लिए बजट में प्रतिशत देने पर दुख जताया। साथ ही न्यू इंडिया के औचित्य पर सवाल पूछा। कहा कि साहित्य मनुष्य के उस अंतस को छूता है, जो बदलता नहीं है। रचना और आलोचना पर मंथन कर विकास कुमार झा ने एक ट्रेन यात्रा को किस्सों से जोड़ा। कहा कि बाजारवाद से वर्तमान समाज को बचाने और संजोने का कार्य साहित्य और कला द्वारा ही संभव है।
कलाकार की दुनिया ही रंगरेज की दुनिया
प्रसिद्ध हिंदी कवयित्री, कथाकार और उपन्यासकार ममता कालिया ने कलाकार की दुनिया को रंगरेज की दुनिया बताया। कहा कि भारतीय समाज परंपरा और नवीनता दोनों को साथ लेकर चलता है। उन्होंने साहित्य को बदलते मानवीय संबंधों का दर्पण बताया। उनके अनुसार भारत निरंतरता में विश्वास करता है जो परंपराएं पहले थीं, वे भी हमारे साथ भी हैं।
साहित्य-कला ने बदले रूझान
कथाकार अशोक ने कहा कि साहित्य और कला के प्रति समाज के रुझान में बदलाव हुआ है। अब वो लगाव और वो समझदारी नजर नहीं आती, जो होनी चाहिए। पत्रकार और लेखक पंकज चतुर्वेदी ने युवाओं को कालिदास जैसे क्लासिक साहित्यकारों को पढ़ने की सलाह दी। साहित्य उसे ही बदल सकता है, जो बदलने के लिए प्रस्तुत हो या बदलाव के लिए तैयार हो।
बनारस लिट फेस्ट - 4000 साल में कई बार बदली हैं भाषाएं : पेगी मोहन
बनारस लिट फेस्ट में प्रख्यात लेखिका पेगी मोहन ने युवानिका चोपड़ा के साथ संवाद किया। भारत और दक्षिण एशिया की भाषाई परंपराओं की बात की। पेगी मोहन ने कहा कि पंजाबी, भोजपुरी सहित कई भारतीय भाषाओं की जड़ें वैदिक और संस्कृत परंपरा में निहित हैं। 4000 वर्षों में ऐतिहासिक घटनाओं और सांस्कृतिक मेल-जोल के कारण भाषाओं में बदलाव होता रहा है। सम्राट अशोक के अभिलेखों का उल्लेख करते हुए पेगी मोहन ने बताया कि लिपि और बोली ने एक-दूसरे को प्रभावित किया है। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय भाषाएं न केवल प्राचीन विरासत की वाहक हैं, बल्कि आज भी जीवंत और प्रासंगिक हैं।