दोनों भाईयों के जुगलबंदी की दीवानी थी दुनिया, उमड़ती थी भीड़
बनारस घराने को दुनिया भर में पहचान दिलाने वाले पं. राजन मिश्र-साजन मिश्र का अलग ही स्थान है। दोनों भाईयों की जुगलबंदी की दुनिया दीवानी थी। जब वह मंच पर आते थे तो उनको सुनने के लिए भीड़ उमड़ती थी। पद्मश्री डॉ. सोमा घोष ने बताया कि उनके घराने ने 400 साल का इतिहास समेटा हुआ था। उनके दादा पंडित बड़े राम मिश्र और पिता पंडित हनुमान मिश्र, चाचाजी गोपाल मिश्र सहित इनके परदादा भी संगीतकार थे।
राजन मिश्रा का मानना था कि बनारस एकमात्र घराना है, जहां संगीत की तीनों विधाएं गायन, वादन और नर्तन मौजूद हैं। ऐसा दूसरे घरानों में नहीं पाया जाता। उन्होंने 1978 में श्रीलंका में अपना पहला संगीत का कार्यक्रम किया और इसके बाद उन्होंने जर्मनी, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, नीदरलैंड, यूएसए, सिंगापुर, कतर, बांग्लादेश और दुनिया भर के कई देशों में अपनी कला का प्रदर्शन किया।
दोनों भाईयों के जुगलबंदी की दुनिया दीवानी थी। दोनों की आवाज भले अलग-अलग थी लेकिन जब एक साथ प्रस्तुति दी जाती थी तो दोनों दो जिस्म एक जान हो जाते थे। पं. राजन मिश्र के जाने के बाद वह जुगलबंदी टूट गई है। तबलावादक पं. रजनीश मिश्र ने बताया कि दोनों भाई पहलवानी केभी शौकीन थे। एक साक्षात्कार के दौरान पं. राजन मिश्र ने बताया था कि उन्हें खेलों के साथ ही प्रकृति के बीच रहना बेहद पंसद है। पं. राजन मिश्र का मानना था कि सही उच्चारण और राग की मर्यादा ही बनारस घराने की खासियत है।