हिंदी की उच्च शिक्षा के हैं जनक
सहायक मंत्री सभाजीत शुक्ला का कहना है कि बाबू श्यामसुंदर दास जी हिंदी को केवल राष्ट्रभाषा नहीं, अपितु अंतरराष्ट्रीय भाषा मानते थे। संविधान में हिंदी का जो रूप है, उसी स्वरूप के वह प्रचारक रहे हैं, जिसे उनके अवसान के बाद देश ने ग्रहण किया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में मालवीय जी ने 1921 में उन्हें हिंदी विभाग का अध्यक्ष बनाया। उस समय तक देश में हिंदी की पढ़ाई एमए कक्षाओं तक नहीं होती थी।
उन्होंने उसकी योजना बनाई, पाठ्यक्रम बनाया, पुस्तकें तैयार कराईं और उसे ऐसा रूप दिया, जिसे सारे देश ने स्वीकार किया। आज हिंदी की उच्च शिक्षा का जो रूप दिखाई पड़ रहा है, उसके जनक के रूप में उनकी प्रतिष्ठा है। हिंदी के काम के लिए उन्होंने देश भर के रत्नों को चुना। उनका उपयोग किया और शिष्यों की ऐसी मंडली बनाई, जिन्होंने भविष्य में अपने-अपने क्षेत्र में नियामक कार्य किए। इस दृष्टि से वे हिंदी रत्नों के रत्नाकार हैं।