आचार्य ने स्पष्ट किया कि पांच अगस्त को कन्या लग्न की जगह तुला लग्न में शिलान्यास होना चाहिए। उस दिन पूर्णिमांत भाद्रपद कृष्ण और अमांत श्रावण कृष्ण द्वितीया बुधवार है। सुबह घनिष्ठा नक्षत्र है। अनंतर शत तारका नक्षत्र है। कन्या लग्न में लग्न से षष्ठ स्थान में कुंभ में चंद्र है और केंद्र में पापग्रह मंगल, राहु, शनि, केतु हैं।
ज्योतिर्विदाभरण में कहा है कि यदि गृहारंभ के समय सप्तम भाव दुष्ट ग्रह से युक्त हो तो अहंकार के अभ्युदय से गृह कलह होती है। इसीलिए कन्या लग्न का मुहूर्त नहीं दिया गया। मंदिर निर्माण के मुहूर्त तुला लग्न दिया गया है। आचार्य ने भूशयन, चंद्र का पाताल निवास, षोडशवर्ग आदि पर भी स्थिति स्पष्ट की।