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स्वरों की गरज-चमक से दिलों के भीतर भीगने का एहसास कराते हैं आषाढ़ी राग

Wed, 05 Jul 2017 06:10 PM IST
amar ujala.com/written by अनूप ओझा
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पद्मभूषण पं. राजन मिश्र - फोटो : अमर उजाला
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आषाढ़ की घटाओं की रिमझिम के साथ संगीत के स्वरों का गहरा नाता है। अमर उजाला इस बार आषाढ़ी रागों के विरह, शृंगार और लोक भावों, धुनों के रस में तर-ब-तर करने के लिए आपके बीच फिर आया है। पिछली बार हमने बनारस घराने से लेकर किराना, मैहर घराने तक के नामचीन ख्याल, ठुमरी गायकों से रूबरू कराया था।
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पद्मविभूषण गिरिजा देवी, पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र, पद्मभूषण पं. साजन मिश्र, लोक गायिका शारदा सिन्हा जैसे नामचीन कलाकारों ने मल्हार,  ठुमरी और कजरी पर अपने अनुभवों को साझा किया था। इस बार हम संगीत जगत की कुछ चुनिंदा हस्तियों के साथ नवोदित कलाकारों की भी स्वर साधना से आपको परिचित कराएंगे। इस विशेष कॉलम की शुरुआत हम कर रहे हैं पद्मभूषण पं. राजन मिश्र से। आइए हमारे साथ आषाढ़ी रागों की फुहार में भीगने के लिए तैयार हो जाइए...।

आषाढ़ी राग मन की मलीनता हरने के साथ हृदय में भरे दुखों को भी निचोड़ देते हैं। कुम्हलाई- मुरझाई पत्तियां कनकना जाती हैं। प्रकृति का आंचल निखर जाता है। तपती-दहकती धरती बारिश की फुहारों से भीग कर हरियाली की घनी चादर ओढ़ लेती हैं। मोर पंख पसार कर नाचने लगते हैं।
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झूलों पर कजरी, अंटारियों से चौमासा, बारहमासा गीत गूंजने लगते हैं। जीवन में नया रास-रंग शुरू हो जाता है। असल में राग मेघ, मल्हार या आषाढ़ी राग का मतलब ही है कि आपके अंदर बारिश होने लगे। स्वरों की बारिश से आत्मा नहा ले। तन-बदन भीग जाए। यह कहना है बनारस घराने के जाने माने ख्याल गायक पद्मभूषण पं. राजन मिश्र का।

ख्याल गायकी के जादूगर पं. राजन मिश्र को अहमदाबाद की वो शाम कभी नहीं भूलती, जब उन्होंने राग मेघ की बंदिश पर आलाप लिया था और वहां मौजूद कुछ लोग भीगने का एहसास करने लगे थे। कुछ महिलाएं इस बात को लेकर चिंतित हो गई थीं कि वह घर से छाता लेकर नहीं आई हैं।

बादलों की इस गरज, बिजली की चमक और बारिश के बीच वह घर जाएंगी कैसे। लेकिन वह आषाढ़ी के राग से पैदा हुआ उनके भीतर का सिर्फ एक एहसास था। वह बाहर निकलीं तो आसमान साफ देख चकित हो गई थीं। वह राग मेघ की बंदिश गुनगुनाते हैं- गगन गरज दमकत दामिनी...।

कहते हैं कि इस राग में स्वरों की दमकशी ही कुछ ऐसी होती है कि बारिश का सुखद अनुभव होने लगता है। राग मियां की मल्हार वह गाते हैं- बदरा आए घोर-घोर बरसन को...। वह बताते हैं कि भारतीय संस्कृति में ही सिर्फ ऐसी सुखद परंपरा रही है कि जन्म भी संगीत से होता है और मृत्यु के समय भी संगीतमय माहौल में बाजेगाजे के साथ पार्थिव शरीर को विदा करते हैं।

फसलों को उगाने का भी गीत है तो प्रियतम को याद करने, मनाने का भी है। पूरा जीवन संगीत को समर्पित है। फिर वह राग देस की बंदिश पर आलाप लेते हैं- बादर रे अरज-गरज बरसन लागे बिजुरी चमकि जिया डेराय...। इसी तरह राग गौड़ मल्हार की रचना को वह स्वरों में निबद्ध कर बरखा बहार की अनुभूति कराते हैं- गरज गरज बरसाने आई मोहरवा बोले पपिहरा...। 
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