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नागरी प्रचारिणी सभा के आर्यभाषा पुस्तकालय को अब संरक्षण की दरकार

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खंडहर बता रहे इमारत कितनी बुलंद थी...। नागरी प्रचारिणी सभा का मुख्य भवन खुद ब खुद 128 साल के गौरव की कहानी कहता है। हिंदी के सबसे प्राचीन आर्यभाषा पुस्तकालय का भवन अब एक हेरिटेज है। संरक्षण के अभाव में यह जीर्णशीर्ण होकर गिरने की कगार पर है। भूतल पर उसका एक हिस्सा तो ढह भी चुका है। नागरी प्रचारिणी सभा में नए सिरे से चुनाव कराए जाने से काशी के साहित्य व हिंदी जगत से जुड़ा हर व्यक्ति उत्साहित है।
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नवगीतकार सुरेंद्र वाजपेयी ने बताया कि नागरी प्रचारिणी सभा के वाराणसी परिसर-स्थित आर्यभाषा पुस्तकालय की दुनिया-भर के अकादमिक और बौद्धिक लोगों के बीच बहुत इज्जत है। दरअसल वह भाषा और साहित्य का एक अनूठा संग्रहालय है। हस्तलेखों का इतना बड़ा संग्रह कहीं और नहीं है। अनुपलब्ध और दुर्लभ ग्रंथों का ऐसा संकलन भी कहीं और मिलना मुश्किल है। आधी सदी पहले तक हिंदी के जानेमाने विद्वान अपने निजी पुस्तक-संग्रह इस पुस्तकालय को प्रदान करते रहे थे। 1893 में स्थापित इस संस्था ने 50 साल तक हस्तलिखित हिंदी ग्रंथों की खोज का देशव्यापी अभियान चलाया।
इसी सभा ने अपने-अपने क्षेत्र के दिग्गज विद्वानों की लगभग लगभग 25 वर्षों की साझा मेहनत के फलस्वरूप हिंदी शब्दसागर नामक हिंदी का पहला, सबसे बड़ा, समावेशी और प्रामाणिक शब्दकोष तैयार किया। इस शब्दसागर की अहमियत का अंदाजा इस बात से भी लग जाता है कि इसकी भूमिका के तौर पर प्रकाशित आचार्य रामचंद्र शुक्ल लिखित हिंदी साहित्य का इतिहास शीर्षक निबंध को पिछले एक हजार वर्षों के साहित्य के इतिहास की सबसे विश्वसनीय और प्रामाणिक आलोचना-पुस्तक के तौर पर आज तक पढ़ा जाता है।
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बंद हैं शोध और अनुसंधान के काम
साहित्यकार व्योमेश शुक्ला ने बताया कि हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि के निर्माण और प्रसार में केंद्रीय भूमिका निभाने वाली 128 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक महत्व की संस्था नागरी प्रचारिणी सभा के हालात चिंताजनक हैं। भारत सरकार के अनुदान से बनी संस्था की अतिथिशाला के साथ-साथ दिल्ली और हरिद्वार-स्थित संपतियों की देखरेख भी नहीं हो रही है।
शिकागो विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर है हिंदी शब्दसागर
लगभग 100 वर्ष पहले इस संस्था द्वारा संकलित, संपादित और प्रकाशित ग्रंथ हिंदी शब्दसागर इन दिनों शिकागो विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर नजर आ रहा है। नागरी प्रचारिणी सभा के ऐतिहासिक मुद्रण और प्रकाशन विभाग अरसे से बंद हैं।
छात्रावास में हुई थी स्थापना
नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना क्वींस कॉलेज की नवीं कक्षा के तीन छात्रों बाबू श्यामसुंदरदास, पं. रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह ने इसी कॉलेज के छात्रावास के बरामदे में बैठकर की। बाद में इसकी स्थापना की तिथि इन्हीं महानुभावों ने 16 जुलाई 1893 निर्धारित की और आधुनिक हिंदी के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास इसके पहले अध्यक्ष हुए। काशी के सप्तसागर मुहल्ले में घुड़साल में इसकी बैठकें होती थीं और बाद में इस संस्था का स्वतंत्र भवन बना।
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