शाह से मुलाकात के पहले दोनों दलों के नेताओं ने अपने-अपने ‘मांग पत्र’ तैयार कर लिए हैं। जानकारी के मुताबिक अद (एस) अब लोकसभा की तीन सीटें और उप्र के पांच निगम चाहती है। दूसरी ओर सुभासपा दो सीटों पर अड़ी है। पार्टी को तीन निगम देने का आश्वासन पहले ही दिया जा चुका है।
कहा जा रहा है कि इसके लिए दोनों दलों ने अपनी-अपनी जातियों के मतदाताओं के साथ-साथ अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र का ब्योरा शाह के सामने रखने का मन बना लिया है। सूत्रों का कहना है कि सपा-बसपा गठबंधन के बाद प्रदेश के मतदाताओं की सोच पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक के बाद फिर बदल गई है।
अब दोनों दल भाजपा पर ‘सीमित दबाव’ ही डाल पाएंगे। भाजपा अब दोनों दलों के साथ 2017 के गठबंधन को लोकसभा में जारी रखने के लिए ज्यादा ‘भाव’ नहीं देगी। पिछड़ों के आरक्षण के मुद्दे पर दोनों दलों की अलग-अलग राय भी भाजपा के पक्ष में है।
ओमप्रकाश राजभर ने बनारस में अति दलित-अति पिछड़ा रैली में भारी भीड़ जुटाकर यह साबित कर दिया कि अभी भी पूर्वांचल में उनका जनाधार कम नहीं है। वे अगर अकेले लड़े तो 2018 के लोकसभा चुनाव में बड़े दलों का चुनावी समीकरण बिगाड़ सकते हैं।
बहरहाल, राजभर को साथ रखना भाजपा की सियासी मजबूरी है वहीं, सुभासपा अध्यक्ष की ओर से भी ऐसे संकेत फिलहाल नहीं मिले हैं जिनसे यह माना जाए कि वे एनडीए से अगल हो रहे हैं। अब सबकी नजर अमित शाह से ओमप्रकाश राजभर की मुलाकात पर है, जिसके बाद सूबे के सियासी परिदृश्य में बदलाव दिख सकता है।
एक बात तो तय है कि सुभासपा अध्यक्ष की नजर 2019 नहीं बल्कि 2022 पर है, जब सूबे में विधानसभा के चुनाव होंगे। पार्टी अगले चुनाव के लिए इतनी मजबूत जमीन तैयार करना चाहती है कि 2022 में सभी दल उससे तालमेल के लिए मजबूर हो जाएं।