फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गंगा की गोद में फिर कल कल निनाद करेगी असि

Sat, 14 May 2016 02:08 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, वाराणसी
विज्ञापन
asi river in varanasi
विज्ञापन
वाराणसी। तीर्थांतराणि सर्वाणि भूमीवलयगान्यपि/असि संमेद तीर्थस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम/ सर्वेषामेव तीर्थानां स्नानधल्लभते फलम्/तत्फलं सम्यगाप्येत नरैर्गगंगसिसंगमे । 
विज्ञापन

स्कंद पुराण के काशी खंड के त्रिस्थली सेतु में पृष्ठ संख्या 161 वर्णित इस श्लोक का अर्थ है कि समस्त भूमंडल के तीर्थ असि संमेद तीर्थ को सोलहवें अंश के बराबर नहीं होते। वहां स्नान करने से समस्त तीर्थों का फल प्राप्त होता है। असि -गंगा संगम काशी का वह प्रधान तीर्थ है जिसके तट पर 15वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसी दास ने श्रीराम चरित मानस की रचना की थी। इसी संगम तट से पंचक्रोशी समेत सभी पापमोचनी पौराणिक यात्राएं भी शुरू होती हैं लेकिन अब न तो वहां संगम रहा और न तो नदी। नदी की धारा मोड़कर नगवा नाले में बहाई जाने लगी तो नगर निगम ने अपने राजस्व रिकार्ड में इसे नाला के रूप में दर्ज कर वाराणसी के अस्तित्व से ही खिलवाड़ कर डाला था लेकिन अब असि के दिन बहुरने वाले हैं। 25 दिन से असि नदी के उद्धार के लिए चल रही अमर उजाला की मुहिम अंतत: रंग लाने लगी है। सूबे की अखिलेश सरकार ने ठहरी हुई असि के उद्धार के लिए योजना बनाने का निर्देश जारी कर दिया है। कल तक नाला कही जाने वाली असि अब स्मार्ट सिटी योजना के एजेंडे में जीर्णोद्धार के लिए विकल्प के तौर पर शामिल कर ली गई है...। 


असि गंग के तीर... की महिमा पर छाई लापरवाही की धुंध छंटने के आसार हैं। वाराणसी के अस्तित्व से जुड़ी नदी अब पुनर्जीवित होगी। कलकल छलछल बहती हुई असि फिर गंगा की गोद में मिलेगी। कूड़े से पाटकर घाट, सीढ़ियों, सड़कों में तब्दील किया गया असि संमेद तीर्थ का संगम फिर होगा और इसके तटवर्ती इलाके नाले की दुर्गंध से मुक्त होंगे। तहसील के राजस्व रिकार्ड में नाला के रूप में दर्ज की जा चुकी असि नदी के उद्धार के सपनों के पंख लग गए हैं। असि नदी स्मार्ट सिटी योजना के तहत काशी के विकास का अहम हिस्सा हो सकती है। इसके लिए पहली बार असि रीवर फ्रंट डेवलपमेंट योजना का विकल्प तैयार कर सुझाव मांगे गए हैं, ताकि आने वाले दिनों में योजना को साकार किया जा सके।  
विज्ञापन



दरअसल भोले की नगरी में मोक्षदायिनी असि का कायाकल्प ही वाराणसी का कायाकल्प होगा। उत्तर में वरुणा और दक्षिण में असि के बहने से ही इस प्राचीन शहर का नाम वाराणसी पड़ा है लेकिन कुछ वर्षों से असि अतीत का हिस्सा बना दी गई थी। नगर निगम, वीडीए, सिंचाई विभाग, राजस्व विभाग और गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई जैसे सरकारी महकमों ने तो इसे नाला साबित करने में कोई कसर ही नहीं छोड़ी है। डीरेका, बीएचयू समेत शहर के बड़े हिस्से के रासायनिक और घरेलू अवजल को असि में बहाने के साथ ही इसकी धारा हो मोड़कर असि का नामकर नगवा नाला के रूप में कर दिया गया है। अब असि-गंगा संगम भी अतीत का हिस्सा बन चुका और असि की धारा भी। इस नदी के उद्धार की मुहिम बीते महीने17 अप्रैल को अमर उजाला ने शुरू की थी, जिसे साझा संस्कृति मंच के बैनर तले 25 से अधिक जन संगठनों ने हाथो हाथ लिया ही नहीं, बल्कि इसे काशी की विरासत को बचाने का मुद्दा बना लिया है।  अंतत: यह जन जागृति अब नई उम्मीदों का दीया बनकर जगमगाने के लिए तैयार है। अंतत: अखिलेश सरकार की नजर असि की पीड़ा की तरफ पड़ गई है। सूबे के मुख्य सचिव आलोक रंजन ने भी इसे अखिलेश सरकार की प्राथमिकता का हिस्सा बताया।


पहले असि-गंगा संगम वाले अस्सी घाट का विस्तार भदैनी तक था। काशी का प्रसिद्ध लोलार्क कुंड तीर्थ भी असि गंग के तीर... का ही प्रधान तीर्थ रहा है। काशी के प्रसिद्ध आदित्यपीठ लोलार्क कुंड के कारण ही गहड़वाल शासकों के दान पत्रलेखों में इसे लोलार्क घाट भी कहा गया है। स्कंद पुराण के काशी खंड के अनुसार गंगा और असि के मिलन स्थली को असि संमेद तीर्थ कहा गया है। इसकी महत्ता संसार के सभी तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ बताई गई है। इस संगम में स्नान करने से सभी तीर्थों का फल मिलने का वर्णन मिलता है। मत्स्य पुराण, अग्निपुराण, कूर्म पुराण, पद्म पुराण के काशी खंड में इसे काशी की दक्षिणी सीमा पर बहने वाली पुण्य सलिला नदी के रूप में बताया गया है। जाबालोपनिषद में कहा गया है कि असि संगम में स्नान करने से मनुष्य के समस्त पापों का नाश हो जाता है। कभी सूर्य, चंद्र ग्रहण स्नान के अलावा गंगा दशहरा, प्रबोधिनी एकादशी, मकर संक्रांति और मौनी आमावस्या पर असि-गंगा संगम में स्नान के लिए भक्तों का रेला उमड़ता था।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें