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...और शुरू हो गया ‘प्रिंस ऑफ बेगर्स’ का सफर

Fri, 29 Jul 2016 02:33 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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पं. बाबूलाल त्रिपाठी व महामना के साथ बैठीं प्रो. अन्नपूर्णा शुक्ला। (फाइल फोटो)
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2 जून, 1913 को हरकोर्ट बटलर ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय सोसाइटी को पत्र भेजकर पांच शर्तों के साथ बीएचयू की स्थापना की स्वीकृति दी थी। उनमें एक बड़ी शर्त थी 50 लाख रुपये की राशि जमा करना। एक सदी पहले यह रकम मामूली नहीं थी। तय हुआ कि विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए पूरे देश में राजाओं-रईसों से दान लिया जाएगा। दान अभियान की शुरुआत 51 रुपये से हुई। फिर जो हुआ वो इतिहास का वह स्वर्णिम पन्ना है, जिस पर आज सहसा यकीन करना मुश्किल है। हालांकि इसके चलते महामना पंडित मदन मोहन मालवीय को ‘प्रिंस ऑफ बेगर्स’ बना दिया।
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यों तो विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए महामना ने दान जुटाने की जिम्मेदारी समिति के पदाधिकारियों को सौंपी थी लेकिन इसकी शुरूआत उन्होंने खुद की और पहला दान लिया पिता से। आचार्य सीताराम चतुर्वेदी के संस्मरण में इसका रोचक उल्लेख मिलता है। महामना उस दिन त्रिवेणी घाट पर बड़े हनुमान मंदिर में दर्शन करके निकले और गायत्री मंत्र का पाठ किया। इतने में उनके पिता सामने आ गए। विश्वविद्यालय की स्थापना को लेकर पिता-पुत्र में वार्तालाप शुरू हुआ तो महामना ने उनको 50 लाख रुपये की शर्त वाली बात बताई। पिता को बेटे के पवित्र संकल्प और दृढ़ निश्चय का पूरा मान था। उस वक्त महामना वकालत भी कर रहे थे। इसलिए पिता ने उन्हें सलाह दी कि वकालत के साथ इस विश्वविद्यालय के निर्माण का दोहरा कार्य ढंग से नहीं हो पाएगा। इसलिए एक राह चुनो। उसी वक्त महामना ने वकालत छोड़ दी और पूरी तरह विश्वविद्यालय के निर्माण में अपना जीवन समर्पित करने का संकल्प ले लिया। त्रिवेणी घाट उस ऐतिहासिक पल का साक्षी बना।


सलाह के साथ महामना को अपने पिता से 51 रुपये का पहला दान भी मिला। फिर यहीं से बीएचयू के लिए दानदाताओं को कारवां शुरू हुआ और बढ़ता ही गया। मालवीय जी ने दान के लिए जो मेहनत, लगन और इच्छाशक्ति दिखाई, उसे देखकर ही लार्ड हार्डिंज ने उनको ‘प्रिंस ऑफ  बेगर्स’ की उपाधि दे डाली। भविष्य के दिनों में यह दिखा भी कि यह उपाधि उनके लिए ही बनी थी।
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बीएचयू में महिला महाविद्यालय की प्राचार्य रह चुकी प्रो. अन्नपूर्णा शुक्ला ने कहा कि मैं भाग्यशाली हूं। मुझे महामना का आशीर्वाद मिला और उनके आशीर्वाद से ही आज मैं कुछ हूं। 1935 में पहली बार मुझे उनके चरण स्पर्श करने का मौका मिला। एक बार मैं गणित के प्रोफेसर रहे अपने पिता स्वर्गीय पंडित बाबू लाल त्रिपाठी के साथ मालवीय भवन में महामना से मिलने गई। महामना ने मुझे आशीर्वाद दिया और पूछा क्या बनना चाहती हूं? जवाब दिया डॉक्टर बनना चाहती हूं। इस पर मालवीय जी ने मेरे  पिता से कहा, इसे खूब पढ़ाना ताकि ये बीएचयू की सेवा कर सके। ये उनका आशीर्वाद ही रहा कि मैंने पटना से एमबीबीएस किया और डॉक्टर बन गई। 20 साल की हुई तब महामना के पुत्र गोविंद मालवीय ने मुझे बुलवाया। उन्होंने कहा कि आपको याद है कि पिता जी ने क्या कहा था? फिर मैं बीएचयू से जुड़ गई। महिला महाविद्यालय के हॉस्टल डिस्पेंसरी की मेडिकल अफसर बनीं। बाद में डोमेस्टिक साइंस की लेक्चरर हुई। ये महामना की दूरदर्शिता ही थी कि उन्होंने 1928 में ही महिला शिक्षा के लिए एमएमवी की स्थापना की और सबसे पहले यहां संस्कृत, डोमेस्टिक साइंस , भारतीय शास्त्रीय संगीत की पढ़ाई शुरू की। जब तक मैं महिला महाविद्यालय से जुड़ी रही, इसे संकाय या संस्थान का दर्जा दिलाने की कोशिश में जुटी रही। आज भी ये प्रयास अधूरा है। शताब्दी वर्ष में महिला महाविद्यालय के स्तर को बढ़ाने से महामना की आत्मा को सबसे ज्यादा सुख, संतोष और शांति मिलेगी।
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