मुरलीधर ने मीडिया से बताया कि हर बाप अपने बेटे की अच्छाई के लिये डाट फटकार लगाता है लेकिन बचपन का जनून मुझे दूर लेकर चला गया। करीब दस साल तक दिल्ली, कोलकाता, मुंबई आदि शहरों में टहला और उसके बाद कोटा में आकर कबाड़ का काम शुरू किया। कुछ दिन कपड़ा बेचने का काम किया। मैं खुद को अपनों के बीच पाकर खुश हूं। पिता जी तो नहीं है लेकिन माता जी हैं उनकी सेवा करूंगा। सबसे खास बात रही कि चार दशक तक गांव से दूर रहे मुरलीधर गांव के हर सख्स को पहचान ले रहे थे।