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किस्से दालमंडी के: यहीं रहती थीं अभिनेता गोविंदा की मां और गायिका निर्मला देवी, गौहर जान का भी था गहरा संबंध

Mon, 10 Nov 2025 05:00 PM IST
प्रगति चंद अनिरुद्ध पांडेय, अमर उजाला, वाराणसी।

सार

वाराणसी के दालमंडी में जहां अभिनेता गोविंदा की मां और गायिका निर्मला देवी रहती थीं उसे आज राजपूत कटरा के नाम से जाना जाता है। वहीं दालमंडी से गौहर जान का भी गहरा संबंध था। यहां पढ़ें इसकी विस्तृत रिपोर्ट...
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इसी जगह पर रहती थीं अभिनेता गोविंदा की मां और गायिका निर्मला देवी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जो करके सितम तुम भूल गए, फिर उसकी जरूरत आज भी है... मुंबई में सिनेमा के विशाल कैनवास पर निर्मला देवी ने जब यह गजल गाई तो देश में उनके कंठ के लाखों दीवाने हो गए। वह वाराणसी के दालमंडी में जहां रहती थीं उसे आज राजपूत कटरा के नाम से जाना जाता है। फिल्म अभिनेता गोविंदा उन्हीं के बेटे हैं। प्रख्यात तबला वादक लच्छू महाराज उनके भाई थे और यहीं रहते थे।

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संगीत मर्मज्ञ राजेश्वर आचार्य ने बताया कि निर्मला देवी उस समय की तमाम चर्चित गायिकाओं से बहुत आगे थीं। उनका कंठ सुरीला था और गायकी के बल पर उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई थी। उनके पिता वासुदेव सिंह अच्छे तबला वादक और संगतकार थे। लक्ष्मीशंकर यानी लच्छू महराज उनकी दूसरी मां के बेटे थे।

मुंबई जाने के बाद निर्मला देवी ने फिल्म अभिनेता और निर्माता अरुण कुमार अहूजा से शादी कर ली। फिल्म सबेरा और घूंघट में पति-पत्नी ने एक साथ काम किया था। पिया मिलन, सेहरा सहित कई और फिल्मों में काम किया। इससे उनकी ख्याति बढ़ी। फिल्म राम तेरी गंगा मैली में भी उन्होंने आवाज दी थी। 
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7 जून 1927 को पैदा हुई निर्मला देवी का 1996 में निधन हो गया था।निर्मला देवी से मुंबई में मिल चुके पक्केमहाल के रहने वाले अभय त्रिपाठी ने बताया कि उनकी आवाज में खनक थी और वह अक्सर यह गजल ‘’मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहे, कि दाना खाक में मिलके गुले-गुलजार होता है... गुनगुनाया करती थीं । 

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इस गजल को लोगों ने पसंद किया था। निर्मला देवी के भाई जयनारायण सिंह वर्तमान में यहां कटरा चलाते हैं। जयनारायण ने ही बताया कि लच्छू महाराज यहीं रहते थे और रियाज करते थे। जब तक लच्छू महाराज थे तब तक यह भवन पुराने स्वरूप में था लेकिन अब इसका स्वरूप बदल दिया गया। गोविंदा भी यहां आ चुके हैं।

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गौहर जान का संबंध भी दालमंडी से था

विख्यात गायिका गौहर जान का संबंध भी दालमंडी से रहा है। उनका असली नाम एजेलिना था। उनकी मां का नाम एडलिन विक्टोरिया था जो बड़ी मल्लिका जान के रूप में विख्यात हुई थीं। गौहर के पिता अंग्रेज और पेशे से इंजीनियर थे। माता पिता की शादी टूटने के बाद वह अपनी मां के साथ यहीं चली आई थीं। नाम बदलकर नृत्य और गायन से अपनी आजीविका चलाने लगीं और ख्याति अर्जित की। बाद में वह मुजरा संस्कृति से दूर हो कर कोलकाता चली गई और नाम रोशन किया। डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह ने बताया कि गौहर जान को ग्रामोफोन गर्ल कहा जाता था। ग्रामोफोन आने के बाद पहला गाना इन्हीं का रिकॉर्ड हुआ था। नरगिस की मां जदद्दन वाई पहली फिल्म संगीतकार बनीं।

चैंबर म्यूजिक की तरह थी दालमंडी
नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल कहते हैं कि दालमंडी एक तरह से चेंबर म्यूजिक की तरह थी। वे कहते हैं कि काशी के तमाम मूर्धन्य संगीतकारों का संबंध दालमंडी से रहा है। भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान ने कहा था कि यदि तवायफें नहीं रहतीं तो मेरी शहनाई में इतनी निखार नहीं आती।
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