हिंदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास शीर्षक की इस पांडुलिपि में आचार्य शुक्ल ने अपने मूल इतिहास-ग्रंथ के सारतत्व को सरल शिल्प और कम शब्दों के जरिये छात्रों के लिए दोबारा लिखा था। इस पुस्तक की पांडुलिपि सभा के कागजों के अंबार में कहीं दब गई थी। करीब 90 साल बाद सफाई के दौरान युवा कार्यकर्ताओं की टीम ने उसे ढूंढ निकाला है।
आज पदयात्रा से शुरू होगा महोत्सव, कल से साहित्यकारों की जुटान : नागरी प्रचारिणी सभा के स्थापना दिवस की पूर्व संध्या पर बुधवार को विशेश्वरगंज स्थित नागरी प्रचारिणी सभा से लहुराबीर स्थित राजकीय क्वींस कॉलेज तक पदयात्रा निकाली जाएगी। पदयात्रा सुबह आठ बजे निकलेगी।
प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने बताया कि 16 जुलाई को स्थापना दिवस महोत्सव के उद्घाटन अवसर पर राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह, आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण, वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय और प्रो. कृपाशंकर चौबे मौजूद रहेंगे। इसके बाद अलग-अलग सत्र होंगे।
1929 में पहली बार हुई थी प्रकाशित
पुस्तक हिंदी साहित्य का इतिहास पहली बार 1929 में प्रकाशित हुई थी। तब से आज तक वह पुस्तक आलोचना और साहित्येतिहास के अनिवार्य आधार ग्रंथ के आसन पर प्रतिष्ठित है। नागरी प्रचारिणी सभा ने उसके अनेक संस्करण प्रकाशित किए। मई 1940 में उसका संशोधित-प्रवर्द्धित संस्करण प्रकाशित हुआ। इसके बाद 10 फरवरी 1941 को आचार्य शुक्ल का निधन हो गया। शुक्ल जी ने नागरी प्रचारिणी सभा के अनुरोध पर इस पुस्तक की भी पांडुलिपि तैयार की थी, लेकिन वह प्रकाशित नहीं हो सकी थी।