काशी विश्वनाथ ट्रस्ट के पूर्व अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी
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राम मंदिर चंदा विवाद के बीच श्री काशी विश्वनाथ ट्रस्ट के पूर्व अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने कहा कि प्रशासनिक सेवा से जुड़े अधिकारियों को मंदिर समिति का पदेन अधिकारी नहीं बनाना चाहिए। वे उच्च अधिकारियों के दबाव में वित्तीय विसंगतियों व चोरी को ढकने का काम करते हैं, क्योंकि वे बदनामी के डर से घिरे होते हैं। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्थलों में वित्तीय पारदर्शिता के लिए भगवान को अर्पित होने वाले सभी कीमती सामानों के लिए एक समर्पित संग्रहालय (म्यूजियम) बनाया जाना चाहिए। इन सामानों को तीन वर्षों तक सहेजने के बाद श्रद्धालुओं में बांट देना चाहिए।
आचार्य अशोक द्विवेदी ने शुक्रवार को रविंद्रपुरी स्थित आवास पर पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अयोध्या राम मंदिर, तिरुपति, केदारनाथ, श्री काशी विश्वनाथ मंदिर समेत अन्य मंदिरों में कर्मचारी और पदाधिकारियों को स्थायी न रखकर अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) पर नियुक्त किया जाना चाहिए। उनके काम की वर्ष में एक बार अनिवार्य रूप से समीक्षा होनी चाहिए। समीक्षा में किसी प्रकार की कमी पाए जाने पर उसे तत्काल हटा दिया जाना चाहिए। मंदिर में तैनात सेवादारों के लिए धार्मिक पोशाक (धोती-कुर्ता) अनिवार्य हो।
उन्होंने कहा, मंदिरों में आने वाले चंदे और सोने-चांदी का बाकायदा ट्रस्ट के पास हिसाब होना चाहिए। इसके साथ ही मंदिरों में चढ़ाए जाने वाले सोने और चांदी को गलाना तुरंत बंद होना चाहिए। मंदिर में जो भी धन आए, वह पूरी तरह पारदर्शी हो। उसे मंदिर के कार्यों के अलावा शेष राशि का कुछ हिस्सा जनता के हित में अस्पतालों और सेना को दिया जाना चाहिए। प्रबंधन में सुधार की रूपरेखा पेश करते हुए पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि मंदिर प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी किसी प्रतिष्ठित विद्वान को सौंपी जानी चाहिए और किसी भी तरह की गड़बड़ी से बचने के लिए सरकारी खुफिया तंत्र के जरिए उनकी निगरानी भी की जानी चाहिए।
इवेंट में बदल रहा है धर्म, आरएसएस पर भी साधा निशाना
धार्मिक संगठनों की वर्तमान कार्यशैली पर प्रहार करते हुए आचार्य द्विवेदी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अपने मूल पथ से विमुख हो रहा है, जो बिना किसी ठोस धार्मिक आधार के 200 से अधिक कथावाचकों और महामंडलेश्वरों को तैयार कर दे रहा है। उन्होंने दुख व्यक्त किया कि वर्तमान में धर्म को सिर्फ एक इवेंट (आयोजन) बनाकर रख दिया गया है। उन्होंने अंत में कहा कि सनातन परंपरा में श्रद्धा का महत्व केवल तीर्थ में होता है, मनोरंजन या पर्यटन में नहीं।