वाराणसी। काशी की धर्म और विज्ञान की प्राचीन परंपरा के सबल समर्थक रहे महंत वीरभद्र मिश्र के निधन की खबर ने न सिर्फ काशी किविशिष्टजनों या उनके निकट रहे लोगों को दुखी किया है बल्कि आम काशीवासियों को भी धक्का लगा है।
तुलसी घाट स्थित उनके आवास के सामने युवा, अधेड़, बुजुर्ग सभी अवाक खड़े थे। बीएचयू की छात्रा सुप्रिया संकट मोचन फाउंडेशन की बिल्डिंग की दीवार से पीठ सटाए खड़ी होकर लगातार आंसू बहाती रही। पूछने पर बोली आज जो कुछ हूं दादा जी (प्रो. वीरभद्र मिश्र) की बदौलत हूं। वह सहारा न देते तो मेरे परिवार का क्या होता। वहां खड़े ऐसे कई लोग महंत जी के उपकारों को अपने आंसू पोछते हुए याद कर रहे थे।
महंत वीरभद्र के अंतिम दर्शन के लिए डा. काशीनाथ सिंह, डा. आनंद बहादुर सिंह, पं. छन्नूलाल मिश्र, डा. अवधेश प्रधान, डा. वाचस्पति, विश्वनाथ मंदिर के महंत राजेंद्र तिवारी, राजेशपति त्रिपाठी, अजय राय, बीएचयू के शिक्षक, आईजी, मैत्री भवन के निदेशक फादर चंद्रकांत, कला प्रकाश के अशोक कपूर, जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के प्रतिनिधि श्रीप्रकाश मिश्र, पुरी पीठाधीश्वर निश्चलानंद सरस्वती के प्रतिनिधि महंत राजेश चैतन्य ब्रह्मचारी, मुफ्ती-ए-बनारस मौलाना बातिन के प्रतिनिधि मोहम्मद इदरीस, धर्म संघ के जगजीतन पांडेय, आर्ट आफ लीविंग के उत्पल पाठक, एपी शुक्ला समेत सैकड़ों लोग तुलसी घाट पहुंचे थे। महंत जी के निधन पर साहित्यकार वर्ग में भी गहरी निराशा है। श्रीकृष्ण तिवारी, सांड बनारसी, डा. अशोक सिंह, कमल नयन मधुकर, रामजी नयन, वैभव वर्मा, मंजरी पांडेय, धर्मेंद्र गुप्त साहित आदि ने भी शोक व्यक्त किया है।