वाराणसी। चंदौली में पुलिस द्वारा कोयले की छह चिमनियां बंद कराने के बाद भी माफिया के इशारे पर झारखंड से लेकर चंधासी तक कोयले का अवैध धंधा बदस्तूर जारी है। गैंगवार के चलते इस धंधे में कई लोगों की जानें जा चुकी हैं। फिलहाल आईजी के निर्देश पर पुलिस टीम इस धंधे के मकड़जाल की जांच में जुटी है।
पुलिस सूत्रों की मानें तो झारखंड से इस धंधे का नेटवर्क चलाने के लिए बनारस के माफिया ने व्यवसायियों का सिंडिकेट बनाया है। इसका अघोषित अध्यक्ष माफिया को प्रति रैक 15 से 18 लाख रुपये देता है। यदि कोई दूसरा गिरोह रैक लगाता है तो उसक ी बोगी में कोयले की जगह ईट-पत्थर लोड करा दिया जाता है। पांच साल पहले गजेंद्र सिंह इंदारा (मऊ) में रैक लगाने में सफल हो गए लेकिन उनकी हत्या कर दी गई। इसी प्रकार ओम सिंह, लखनऊ में मनोहर सिंह समेत कई लोग गैंगवार के चलते मारे गए। पिछले साल धनबाद में सुरेश सिंह की हत्या भी इसी कारण हुई। पुलिस सूत्रों का मानना है कि पहले कोयले के धंधे पर मजदूर नेता सूर्यदेव सिंह का वर्चस्व था। उनकी मौत के बाद यह धंधा माफिया के हाथ में चला गया। 2003 में पिता की जगह काम देख रहे सूर्यदेव सिंह के पुत्र राजीव का अपहरण कर लिया गया था।
इस धंधे से जुड़े व्यवसायियों का कहना है कि बरसात के सीजन को छोड़कर कोयले की रैक आठ माह चलती है। व्यासनगर, इंदारा, फैजाबाद में कोयले की काफी रैक उतरती है, जबकि आजमगढ़ में बेहद कम। रैक लगने के बाद माफिया के रेट पर ही व्यवसायी कोयला लेते हैं। माफिया को प्रतिमाह डेढ़ करोड़ मिलता है। पार्टनरशिप में यह कारोबार और बढ़ जाता है। इस धंधे पर कब्जा जमाने के लिए मुख्तार, मुन्ना बजरंगी समेत अन्य गैंग ने काफी प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। व्यवसायी जिन ट्रकों से कोयले की ढुलाई कराते हैं वे भी माफिया गिरोह के ही होते हैं। इसके अलावा माफिया के इशारे पर सोनभद्र से लेकर कई जिलों में कोयला चोरी का धंधा भी चल रहा है। पता चला है कि जेल में बैठा माफिया इस नेटवर्क को चला रहा है। उसका रिश्ता सत्ता में बैठे बड़े सफेदपोशों से भी है।