सारनाथ। सभी धर्मों और संप्रदायों में कुछ न कुछ अच्छी बातें होती हैं। उनको अंगीकार करना ठीक है लेकिन अपने धर्म और परंपरा पर कायम रहना चाहिए। दूसरों को शिक्षा देते समय भी धर्मांतरण कराने की बात मन में नहीं लानी चाहिए। दूसरे धर्म में किसी को अच्छी तरह विचार करने के बाद स्वेच्छा से जाना चाहिए। ये बातें तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने कहीं। सारनाथ के केंद्रीय तिब्बती उच्च अध्ययन विश्वविद्यालय के कालचक्र मंडप में उन्होेंने प्रतीत्यसमुत्पाद, उद्यम, त्याग पर प्रकाश डाला।
बुधवार को आचार्य शांतिदेव रचित बोधिचर्यावतार के छठवें और सातवें अध्याय की विवेचना करते हुए उन्होंने कहा कि पश्चिमी तिब्बत की एक शरणार्थी महिला की मिशनरी संस्थाओं ने मदद की और उसके परिवार ने ईसाई धर्म अंगीकार कर लिया। वह मिलने आई और उसने कहा कि इस जन्म में तो वह ईसाई हो गई है लेकिन अगली बार बौद्ध परिवार में जन्म लेना चाहती है। ऐसी स्थिति में धर्मांतरण करने वाला द्विविधा में रहता है और किसी धर्म का नहीं रहता। बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए नित नई संस्थाएं बन रही हैं। उनको धर्मांतरण से बचना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धर्म व्यक्तिगत अभ्यास की चीज है। धर्म कोई भी हो लेकिन प्रतीत्यसमुत्पाद के वैज्ञानिक तत्व और बौद्ध दर्शन से दुनिया का कल्याण हो सकता है। पुण्य के प्रति उत्साह ही वीर्य पारमिता (उद्यम) है। आलस्य उद्यम का सबसे बड़ा शत्रु होता है। चित्त की क्षमता को जानते हुए आलस्य त्याग कर लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयास करने वाला ही सफल होता है। उन्होंने कहा कि दुख का मूल कारण अज्ञान है और प्रज्ञा से उसे दूर किया जा सकता है। प्रज्ञा के लिए त्याग जरूरी है। आमतौर पर जब शक्ति और संपदा आती है तो अहंकार भी बढ़ जाता है। महात्मा गांधी ने इस अभिमान को नहीं आने दिया। उनके त्याग के चलते ही पूरी दुनिया उनका आदर करती है। प्रतीत्यसमुत्पाद ही बौद्ध धर्म का मूल है और वैज्ञानिक है। व्यक्ति कुशल आचरण करे तो शांति स्थापित हो जाएगी। चित्त को एकाग्र करके व्यक्ति सफलता प्राप्त कर सकता है। एकाग्रता के लिए शमथ भावना का अभ्यास जरूरी है। इसके साथ प्रज्ञा के जुड़ने पर यह विपश्यना हो जाती है। आरंभ में पालि, जापानी, वियतनामी और अंग्रेजी में मंगलाचरण किया गया।