वाराणसी। हरि प्रबोधिनी एकादशी का चांद जैसे-जैसे चढ़ता गया रस की बरसात तेज होती गई। कलकल करती गंगा भी शांत होकर सुरों को सुनती और गुनती रही। रविदास घाट के मुक्ताकाशी मंच पर पहले दिन कलाकारों ने कुछ ऐसा ही रंग जमाया। तीन दिनों तक चलने वाले इस संगीतमय महोत्सव के पहले दिन शास्त्रीय एवं फिल्मी संगीत का अजीब फ्यूजन देखने-सुनने को मिला। ओडिसी नृत्यांगना सोनल मानसिंह की नृत्य मुद्राओं और रोनू मजुमदार ने खड़ताल, तबला और अफ्रीकी साज जंबो के साथ बांसुरी के सुरों को पिरोकर अद्भुत समां बांधा। इन सबके बीच युवा पार्श्व गायक जावेद अली ने अपने गीतों से सबको थिरकने पर मजबूर कर दिया।
सूबे के पर्यटन मंत्री ओम प्रकाश सिंह, पं. छन्नूलाल मिश्र और प्रशासनिक अधिकारियों ने दीप जलाकर महोत्सव की शुरुआत की। उसके बाद मंच उस्ताद अली अब्बास खान को सौंप दिया गया, जिन्होंने शहनाई पर मंगल धुन बजाई। निशा की दूसरी कलाकार ओडिसी नृत्यांगना सोनल मानसिंह भावों और मुद्राओं से शिव और भवानी की स्तुति की। गंगावतरण की कथा प्रस्तुत की। ‘कर्पूर गौरम करुणावतारम’ और ‘भवानी दयानी...’, ‘मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो...’ के अलावा मानस की चौपाइयों पर फुलवारी और सीता के प्रसंगों के भाव प्रदर्शित कर वाहवाही बटोरी। आखिरकार वह यह कहते हुए मंच से विदा हुईं कि वक्त होता तो और उनके संगीत खजाने में लुटाने को बहुत कुछ बाकी है। अबरार हुसैन ने सरोद, विनय प्रसन्ना बांसुरी, प्रशांत मंगराज ने पखावज पर उनका साथ दिया।
मंच पर चिनगारी, राजनीति, रांझणा जैसी कई फिल्मों मेें गायन कर चुके पार्श्व गायक जावेद अली जैसे ही मंच पर आए वातावरण तालियों से गूंज उठा। जब उन्होंने ‘कहने को जश्ने बहारा है’ गाना शुरू किया तो घाट पर जुटे युवा थिरकने लगे। ‘फूल से खुशबू खफा खफा है गुलशन में...’, ‘अर्जियां सारी मैं चेहरे पे लिख के लाया हूं...’ और ‘मौला मौला मौला मेरे मौला...’ जैसे गीतों ने युवाओं को तो स्वर में स्वर मिलाने पर मजबूर किया ही, जिलाधिकारी प्रांजल यादव भी गाने से खुद को रोक नहीं पाए। शास्त्रीय संगीत के बीच में जावेद की यह प्रस्तुति थोड़ी अटपटी जरूर लगी लेकिन यह बात तब नेपथ्य में चली गई जब मंच पर रोनू मजूमदार ने बांसुरी में फूंक मारी और स्वर लहरियां लुटानी शुरू कीं। उनके साथ दक्षिण अफ्रीकी साज जंबो पर उस्ताद जाकिर हुसैन के छोटे भाई तौफीक, खड़ताल पर गाजी खान और तबले पर रामकुमार मिश्र ने ऐसी संगत की कि कुछ पल के लिए तालवाद्य कचहरी की स्मृति हो आई। राग हंसध्वनि के बाद मांड ‘केसरिया बालम आओ पधारो म्हारो देस...’ और बेमौसम की कजरी भी बजाई। पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र के अलावा मंडलायुक्त आरएम श्रीवास्तव, डीएम प्रांजल यादव, डीआईजी और एसएसपी जोगिंदर कुमार अंत तक मौजूद थे।
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मोक्ष ही नहीं अब जन्मदिन मनाने की जगह हुई काशी
वाराणसी। काशी बदल रही है। अब तक माना जाता रहा है कि लोग यहां मोक्ष की कामना से आते हैं लेकिन अब तो जन्मदिन भी मनाने आने लगे हैं। गंगा महोत्सव का उद्घाटन करने के बाद यह बात पर्यटन मंत्री ओमप्रकाश सिंह ने कही। उन्होेंने कहा कि काशी में पर्यटन को बढ़ावा देने में सूबे की सरकार धन की कमी नहीं आड़े नहीं आने देगी। उन्होंने गंगा की स्वच्छता के लिए जन आंदोलन शुरू करने का आह्वान किया और कहा कि जनता की भागीदारी के बिना यह काम नहीं हो सकता है। काशी ईमानदारी और इनसानियत का शहर है। यहां के जर्रे-जर्रे में सांस्कृतिक विरासत समाई हुई है। यहां का संदेश दुनिया भर में प्रसारित होता रहा है और लोगों को प्रेरणा देता रहा है।
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