फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बुल्के का शोध नई पीढ़ी को दिखाएगा राह

Sun, 05 Oct 2014 05:31 AM IST
Varanasi
विज्ञापन
विज्ञापन
वाराणसी। दक्षिण एशिया की कला-संस्कृति में राम के आदर्श की छाप रची-बसी है। बेल्जियम के सिविल इंजीनियर फादर कामिल बुल्के ने भारत में रामकथा पर अध्ययन और शोध का जो काम किया, वह आने वाली पीढि़यों के लिए प्रेरणाप्रद बनेगा। उनका मार्ग प्रशस्त करता रहेगा। फादर की जयंती को मेले जैसा वृहद रूप दिया जाना चाहिए। मंगलवार को पराड़कर भवन में कामिल बुल्के की जयंती पर आयोजित संगोष्ठी में सूबे की संस्कृति एवं महिला कल्याण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अरुण कुमारी कोरी ने बतौर मुख्य अतिथि ये बातें कहीं।
विज्ञापन

‘रामकथा: साहित्य, समाज और कला में’ विषयक संगोष्ठी में कोरी ने कहा कि पश्चिमी हवा के झोंके के बावजूद राम के आदर्श समाज के लिए अनुकरणीय बने हैं। हमें अपनी संस्कृति का संरक्षण और पोषण करते रहना चाहिए। रामकथा के विश्लेषण और हिंदी-अंग्रेजी शब्दकोष पर जब भी चर्चा होगी, तब पद्मभूषण फादर बुल्के का चेहरा सहज रूप से याद आएगा। उन्होंने 1950 में प्रकाशित बुल्के की पुस्तक ‘रामकथा-उत्पत्ति और विकास’ को राम के चरित्र पर खोजपूर्ण और अपने तरह की अनूठी कृति बताया। इससे पहले प्रोजेक्टर के जरिये दक्षिण एशिया से यूरोप तक विकसित राम के चरित्र पर आधारित चित्र शैलियों, लीलाओं को रेखांकित किया गया। इंडोनेशिया, श्रीलंका और अमेरिका में रामलीलाओं के मंचन की शैलियों पर रोशनी डाली गई। इस मौके पर प्रो. अवधेश प्रधान, प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह, प्रो. गिरीश चंद्र चौधरी ने भी विचार व्यक्त किए। संचालन अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह ने किया। सहयोग किया सोसाइटी फार मीडिया एवं सोसल डेवलपमेंट के अध्यक्ष दयानंद और संचालन डॉ. श्रद्धानंद ने।

इनसेट-

कथक में संजोए रामकथा के भाव
वाराणसी। पद्भूषण फादर कामिल बुल्के की जयंती पर मंगलवार की शाम पराड़कर स्मृति भवन के गर्दे सभागार में कथक नृत्य पर राम कथा की भावपूर्ण प्रस्तुति की गई। माता प्रसाद, रविशंकर मिश्र और ममता टंडन ने राम के जन्म से लेकर रावण से युद्ध तक की लीलाओं को नृत्य के जरिये मोहक अंदाज में प्रस्तुत किया।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें