वाराणसी। प्राचीन काशी (पक्का महाल) को विश्व हेरिटेज का दर्जा दिलाने की मुहिम अगस्त से छेड़ी जाएगी। काशी की सभ्यता, संस्कृति को सहेजने और उसका संवर्धन करने के उपायों पर मंथन के लिए नौ अगस्त को कबीर चौरा मूलगादी मठ में बनारस सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। इसमें साहित्यकार, संगीतज्ञ और स्वयंसेवी संगठनों के प्रतिनिधि भागीदारी करेंगे। इसमें बनारस के बहुलतावादी और समवेशी इतिहास को यहां के स्कूलों में पढ़ाने, शिव के वाहन नंदी (सांड़) के लिए पेयजल और डॉक्टर मुहैया कराने की भी मांग उठाई जाएगी।
सम्मेलन का उद्घाटन सरोद वादक विकास महाराज और तबला वादक प्रभाष महाराज पंचनाद से करेंगे। उसके बाद काशी की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की जाएगी। मानवाधिकार एवं जन निगरानी समिति (पीवीसीएचआर) की पहल पर होने वाले इस सम्मेलन के लिए पर्चा छापा गया है, जिसमें कहा गया है कि काशी से हिंदू, इस्लाम, ईसाई, यहूदी, बहाई, बौद्ध, जैन, सिख और सूफी समाज की विभूतियों का गहरा जुड़ाव रहा है। संगीत, साहित्य और कला का यह केंद्र गंगा तटीय सभ्यता का हेरिटेज है। बनारस के बहुलतावादी एवं समवेशी इतिहास को कम से कम यहां के स्कूलों में जरूर पढ़ाया जाना चाहिए। पुराना शहर इसी समवेशी संस्कृति का नमूना है और इसे सिंगापुर की तरह हेरिटेज के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए। इसके अलावा शिव की नगरी में उनके वाहन नंदी की भी सुरक्षा की गारंटी की जानी चाहिए। पीवीसीएचआर के समन्वयक डा. लेनिन ने बताया कि सम्मेलन के लिए विभिन्न संगठनों को जोड़ने की योजना पर काम चल रहा है। साहित्यकारों, संगीतकारों और राजनेताओं को पत्र भेजे जा रहे हैं। वैश्वीकरण के दौर में काशी की संस्कृति को नुकसान पहुंच रहा है, हमारी कोशिश इसे सहेजने के प्रति सरकार को संवेदनशील बनाने की है।