वाराणसी। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला मानव मुक्ति के रचनाकार थे। वे कविता के साथ-साथ भाषा और समाज की भी मुक्ति चाहते थे। उन्हाेंने कविता की चली आर ही परंपरा में मुक्त छंद का एक नया अध्याय जोड़ा। ये बातें मंगलवार को बीएचयू के राधाकृष्णन सभागार में निराला पर आयोजित व्याख्यानमाला में साहित्यकार अरुण कमल ने कहीं।
उन्हाेंने कहा कि निराला के संपूर्ण चिंतन में वही समाज रहा जो हाशिए पर था। इसी वजह से उन्हाेंने स्त्री और दलित को अपना विषय बनाया, जहां मुक्ति का संघर्ष ही मूल उद्देश्य रहा है। उन्हाेंने कहा कि निराला हिंदी-उर्दू एकता के प्रबल समर्थक थे। कला संकाय के प्रमुख प्रो. एमएन राय ने निराला को संस्काराें वाला रचनाकार बताया। उन्हाेंने कहा कि निराला सामाजिक और राजनीतिक चेतना के लेखक थे। कार्यक्रम में प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल, डा. प्रभाकर सिंह, प्रो. बलराज पांडेय, अवधेश प्रधान और वशिष्ठ अनूप आदि ने भी विचार व्यक्त किए।