वाराणसी। निजता मानवजन्म से जुड़ा हुआ एक अभिन्न हिस्सा है। भारतीय संविधान के मूल अधिकारों में भले ही निजता का अधिकार स्पष्ट रूप से वर्णित न हो परंतु संविधान का किसी बात पर शांत होना उसका इंकार नहीं हो सकता है। उक्त विचार राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के संयुक्त निदेशक प्रो. डीपी वर्मा ने व्यक्त किए।
वह गुरुवार को बीएचयू के विधि संकाय द्वारा पुत्तास्वामी केस और मानव अधिकार न्यायशास्त्र विषय पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। प्रोफेसर वर्मा ने अपने वक्तव्य की शुरुआत करते हुए निजता के बदलते आयाम को एक कड़ी चुनौती बताया जिस चुनौती को पार करने के लिए भारतीय न्यायालय का 2017 का पुत्तास्वामी बनाम भारतीय संघ का 570 पन्नो का निर्णय एक सफल प्रयास है। इस मामले में दूसरा मुद्दा यह रहा कि निजता शब्द का अर्थ अस्पष्ट है और यह समय और काल के अनुसार परिवर्तनीय है। इसीलिए बिना किसी स्पष्ट परिभाषा के इसे मूल अधिकारों में जोड़ा जाना उचित नहीं है। कार्यशाला में धन्यवाद ज्ञापन संकाय के वरिष्ठ प्रो. मुरली ने किया।