72 वर्षीय अरशद और 65 वर्षीय जुबैदा अब चाह कर भी अब एक नहीं हो पा रहे। वजह सात वर्ष पूर्व गुस्से की हालत में अरशद का जुबैदा को तीन तलाक दे देना। अब एक होने के लिए शरीयत के मुताबिक हलाला अड़चन पैदा कर रहा। हर हाल में शरीयत को भी मानना है।
ऐसे में अरशद के दिल का दर्द आंसू बनकर छलक पड़ रहा। उसे रह-रह कर यह बात कचोट रही कि काश वह गुस्से में तीन तलाक न देता तो यह नौबत ही न आती।
खेतासराय निवासी जुबैदा द्वारा कोर्ट में किए गए घरेलू हिंसा के मुकदमे में वारंट जारी होने पर मंगलवार को 72 वर्षीय उसका पति अरशद आजमगढ़ से जौनपुर के दीवानी न्यायालय आया था। जहां उसने वारंट रिकाल कराकर कोर्ट की कार्यवाही पूरी की।
कुरेदने पर अरशद की आंखे भर आई, बोले, सात साल पहले पत्नी जुबैदा को तीन तलाक दे दिया था। बच्चे, पोते-पोती बाहर रहते हैं।
अब मैं जुबेदा को वापस बुलाना चाहता हूं, लेकिन हलाला के कारण वह मेरे पास नहीं आ पा रही है, क्योंकि हलाला के अनुसार जब तक वह दूसरे से निकाह न करे और वह पति उसे छोड़ न दे तब तक वह मेरे पास नहीं आ सकती। गुस्से में दिया गया तीन तलाक इतना कष्टकारी होगा, इसकी कल्पना भी नहीं की थी।
तीन तलाक और हलाला अत्यंत कष्टकारी है, लेकिन शरीयत में यह व्यवस्था है तो उसका पालन तो करना ही पड़ेगा।
लेकिन अब लगता है कि तीन तलाक और हलाला खत्म होना चाहिए।
हलाला की व्यवस्था अगर खत्म हो जाती तो मैं और जुबेदा पुन: एक हो जाते और एक साथ रहते। वृद्ध होने के कारण कोई देखभाल करने वाला नहीं है। जुबैदा ने परिवार न्यायालय में भी पति के खिलाफ भरण पोषण का मुकदमा कर रखा है।
उसने भी करीबियों से कहा कि मैं अरशद के साथ रहकर उनकी देखभाल करना चाहती हूं, लेकिन इस उम्र में हलाला कैसे संभव है।