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‘लोक साहित्य की समझ के लिए रुचि जरुरी’

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वाराणसी। काशी की लोक परंपरा हर दिशा में अथाह है। लोक साहित्य में जो मिठास है, उसको समझने के लिए लोक रुचि जरूरी है। लोक जीवन में शास्त्रीय, ध्रुपद, उपशास्त्रीय, बिरहा और कजरी के अखाड़े थे। इसमें कजरी के अखाड़े होते थे जो सारी रात चलते थे। वे अखाड़े अब टूट गए। बिरहा ने इस चीज को संभाला और आज वह बचा है। उक्त बातें आईआईटी बीएचयू के मालवीय उद्यमिता संवर्धन केंद्र में चल रहे काशी कथा के 10वें दिन काशी की लोकगीत परंपरा पर चर्चा करते हुए पं. हरिराम द्विवेदी ने कही।
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वहीं दूसरे सत्र में काशी का शास्त्रीय संगीत और घराने पर बोलते हुए पद्मश्री डॉ. राजेश्वर आचार्य ने कहा कि बनारस में घराना अब न के बराबर है। अब कला के नाम पर आत्म विज्ञापन हो रहा है। आत्माभिव्यक्ति और आत्म विज्ञापन में अंतर को समझना होगा। शब्दों से ज्यादा स्वरों से बातें कही जा सकती है। संगीत आह की राह और आनंद की थाह है।
इस दौरान काशी प्रदक्षिणा समिति के उमाशंकर गुप्ता को काशी में कराई जा रही 20 से अधिक यात्राओं के लिए लिए सम्मानित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. एसएन उपाध्याय, संचालन प्रो. पीके मिश्र और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अवधेश दीक्षित ने किया। इस दौरान गोपेश पांडेय, बलराम यादव, अभिषेक यादव, अनिमेष मिश्र, उपेंद्र दीक्षित, हरिशंकर यादव आदि मौजूद रहे।
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