वाराणसी। बीएचयू के हिंदी विभाग में प्रोफेसर सदानंद शाही की छत्तीसगढ़ के बिलासपुर यूनिवर्सिटी में कुलपति पद पर वापसी होगी कि नहीं, अब इस पर अंतिम फैसला राजभवन को ही करना है। 23 मई को इनको कुलपति बनाए जाने के बाद बीएचयू के विधि संकाय के छात्र सौरभ तिवारी ने 29 मई को कुलाधिपति को पत्र लिखकर अर्हता पूरी न करने का आरोप लगाते हुए नियुक्ति पर सवाल उठाया था। मामले में कुलाधिपति ने 30 मई को नियुक्ति आदेश पर रोक लगाते हुए 12 जून को तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित कर दी। अब इस मामले में दोनों पक्षों की सुनवाई पूरी होने के बाद कुलाधिपति और छत्तीसगढ़ के राज्यपाल बलरामजी दास टंडन के फैसले पर सब निगाहें टिकी है।
सौरभ ने अपनी शिकायत में कहा था कि प्रो. शाही कुलपति पद के लिए जरूरी अर्हताएं पूरी नहीं करते हैं। छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय अधिनियम के तहत यूजीसी की ओर से जारी विज्ञापन में कुलपति पद पर 10 साल की प्रोफेसरशिप वाले शिक्षकों से आवेदन मांगा गया था। प्रो. शाही का प्रोफेसर पद पर अनुभव नौ साल छह माह का है। अब मामले में गठित जांच कमेटी के सामने छह जुलाई को जहां प्रो. शाही ने अपना पक्ष रखते हुए जांच कमेटी पर सुनने का मौका न देने का आरोप लगाया। यह भी बताया कि रिसर्च साइंटिस्ट और प्रोफेसर रहने की अवधि में भोजपुरी अध्ययन केंद्र का समन्वयक होने को जोड़कर 10 साल बताया गया है। उधर, सौरभ ने कमेटी को अपने आरोपों के बाबत पूरे साक्ष्य प्रस्तुत कर बताया कि प्रो. शाही के पास 10 साल की प्रोफेसरशिप नहीं है।