बीएचयू के भारत अध्ययन केंद्र में सात दिन की कार्यशाला शुरू हुई। इसका विषय प्राण से प्रज्ञा: प्राणायाम, त्राटक और प्रेक्षा ध्यान का कला एवं विज्ञान रखा गया है। केंद्र के योग सभागार में ऑफलाइन और ऑनलाइन जुड़े यूनाइटेड किंगडम (लंदन) और ट्रिनिडाड और टोबैगो सहित कई देशों से भी प्रतिभागियों को क्लासिकल कपालभाति, सेक्शनल ब्रीदिंग (अधम, मध्यम और आध्य श्वसन), शरीर प्रेक्षा और कायोत्सर्ग का व्यावहारिक अभ्यास कराया गया। बताया कि ये तकनीक श्वसन तंत्र को मजबूत बनाने, शरीर और मन के तनाव को कम करने, एकाग्रता बढ़ाने और आंतरिक शांति व संतुलन विकसित करने में काफी प्रभावी है। इसमें शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक संतुलन, आत्म-जागरूकता के साथ ही आंतरिक चेतना के विकास को दिखाया गया।
केंद्र के समन्वयक प्रो. शार्दिंदु कुमार तिवारी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में योग केवल स्वास्थ्य संवर्धन का साधन नहीं, बल्कि व्यक्तित्व, चरित्र और चेतना विकास का मार्ग है। छात्र अधिष्ठाता प्रो. रंजन कुमार सिंह ने विद्यार्थियों और शोधार्थियों से योग को अपनी दैनिक जीवनशैली का अभिन्न अंग बनाने की बात कही।
श्वास, शरीर, मन और चेतना के बीच संबंध
केंद्र की सेंटेनरी विजिटिंग फेलो डॉ. गीता योगेश भट्ट ने प्राण से प्रज्ञा की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि श्वास, शरीर, मन और चेतना के बीच गहन संबंध को समझे बिना समग्र स्वास्थ्य की कल्पना संभव नहीं है। मालवीय भवन के योग प्रशिक्षक डॉ. योगेश कुमार भट्ट ने श्वास को जीवन ऊर्जा का मूल स्रोत बताते हुए प्राणायाम की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के साथ ही उसके स्वास्थ्यवर्धक प्रभावों को गिनाया। पहले दिन के अभ्यासों ने उन्हें शारीरिक विश्रांति, मानसिक एकाग्रता और आंतरिक शांति का अनुभव कराया।