ज्ञानपुर। मजदूरों का पलायन रोकने के लिए मनरेगा योजना जिले में बेदम साबित हो रही है। 100 दिन के रोजगार की गारंटी देने वाली योजना के तहत वित्तीय वर्ष 2017-18 में जिले के केवल तीन फीसदी मजदूरों को ही म़ुकम्मल रोजगार मिल सका। जिले में 1.13 लाख मनरेगा मजदूर पंजीकृत हैं, जिनमें लगभग तीन हजार को ही सौ दिन का काम मिलता है। 89 हजार मजदूरों को यदा-कदा काम मिलता है।
बढ़ती जनसंख्या और रोजगार की कमी से गांवों से लोग कमाने के लिए दूसरे प्रांतों की ओर रुख करते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2008-09 में यूपीए सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना को लागू किया। इसमें पंजीकृत मजदूरों को 100 दिन काम देने का प्रावधान है। काम करने वाले मजदूरों को प्रतिदिन के हिसाब से 175 रुपये मजदूरी दी जाती है, लेकिन जिले में वित्तीय वर्ष 2017-18 में मजदूरों को समुचित काम नहीं मिल सका। विभागीय आंकड़ों पर गौर किया जाए तो एक लाख 13 हजार मनरेगा मजदूर पंजीकृत हैं, जिसमें 89 हजार मजदूर सक्रिय हैं। इसमें 10 से 20 दिन काम पाने वाले 40 से 50 हजार, जबकि 20 से 50 दिन काम पाने वाले मजदूरों की संख्या 30 से 35 हजार है। 100 दिन तक काम पाने वाले मात्र ढाई से तीन हजार मजदूर हैं। कमोबेश यही हाल श्रम विभाग में पंजीकृत श्रमिकों का है। यहां 26 हजार निर्माण श्रमिक हैं, जिसमें पांच हजार को ही केंद्र और प्रदेश सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल सका है। योजना जिम्मेदारों की लापरवाही से पतली हो गई है। पंजीकृत 1.13 मनरेगा मजदूरों में तीन हजार मजदूरों को सौ दिन का रोजगार मिल सका है। इससे मजदूरों का जीवन स्तर सुधारने की सरकारी कवायदों की संजीदगी का अंदाजा लगाया जा सकता है। श्रमायुक्त मनरेगा अजीत सिंह ने कहा कि पंचायत स्तर से प्रस्ताव बनाकर नहीं दिया जाता। जिसके चलते मनरेगा के कार्य धीमा हो जाता है। अब सभी कार्य आनलाइन होने से गड़बड़ी नहीं हो पाता। जिससे बिना प्रस्ताव के कोई कार्य नहीं होते। इससे भी काम मिलने की समस्या बढ़ी है।