सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा, करिहउं जातुधान कर नासा॥ धावा क्रोधवंत खग कैसें, छूटइ पबि परबत कहुं जैसे...शब्दों से जटायु ने सीता को भय मुक्त रहने को कहा। कहा कि डरो नहीं मैं इस राक्षस का वध करुंगा।
पौराणिक कथा रामायण के प्रसंग जटायुवधम पर आधारित नाटक का मंचन सोमवार को नागरी नाटक मंडली के मंच पर थिएटर ओलंपिक में किया गया। मंच पर बलशाली जटायु के उस प्रयास को दिखाया गया है जो उन्होंने सीता हरण के दौरान रावण से बचाने के लिए किया था। सोमवार को केरल के अंागिक कुडियट्टम कलाकेंद्र की ओर से निर्देशक कलामंडलम संगीत चाक्यार की ओर से एक घंटा 45 मिनट के संस्कृत में प्रस्तुत नाटक को दर्शकों ने बेहद सराहा।
नाटक का आरंभ रावण और उसके सारथि सेतु के साथ होता है, जो सीता को अपने रथ में ले जा रहे हैं। सीता को रोते देखकर रावण उसे सांत्वना देने का प्रयास करता है। सीता, सेतु से मदद की गुहार लगाती है, तभी उन्हें एक पक्षी अपनी तरफ़ आता दिखाई देता है। जटायु सीता को मदद के लिए पुकारते हुए सुनता है और उनकी मदद के लिए उड़कर आता है। रावण अपने सारथि को जटायु को मारने के लिए कहता है। जटायु और रावण के बीच द्वंद्व होता है और जब रावण को लगता है कि वह जटायु को हरा नहीं पाएगा तो वह उसका दायां पंख काट देता है। नाटक का अंत इसके बाद रावण के लंकागमन के साथ होता है। नाटक में संगीत चाक्यार, कृष्णेंदु, मंजुनाथ, चारू अगरू, रवि कुमार, विनीश, सुधीश, सजिथा और शिबू ने बेहतरीन अभिनय किया।
बयान
जटायुवध की नृत्य-रचना बिना किसी संरचनात्मक अवधि के पारम्परिक शैली में की गयी है। इस कथा में यही वह हिस्सा है, जो अथाह ऊर्जा और सामूहिक प्रयास से खेला गया है। इस अंक को अपनी सख़्त शास्त्रीय संरचना के चलते चार घंटे से ज़्यादा समय दरकार है। लेकिन नाटक में निर्देशक ने प्रस्तुति में उसके क्त्रसफ़्ट से कोई समझौता किए बगै़र इस अवधि को बदला है। - संगीत चाक्यार, निर्देशक