वाराणसी। काशी पुराधिपति जब दूल्हा बनकर निकले तो पूरा शहर उनकी बारात में शामिल होने के लिए उमड़ पड़ा। शिव के विभिन्न स्वरूपों के साथ ही ब्रह्मा, विष्णु, गणेश, भैरव, भूत, पिशाच और गणों की टोलियां झूमकर निकलीं। मानों तीनों लोक साक्षात धरती पर उतर आए हों। हर गली, हर डगर बस हर-हर महादेव, बम-बम भोले... का जयघोष और मगन होकर झूमते-नाचते बाबा के बाराती। महाशिवरात्रि पर्व पर धर्म की नगरी काशी में बाबा के विवाहोत्सव के ऐसे ही रंग हर तरफ छाए नजर आए। शहर के विभिन्न हिस्सों से शिव बारात देर रात तक निकलती रही। इस दौरान जमकर अबीर-गुलाल उड़े। आस्था और उल्लास की चमक के साथ फागुन के रंग भी चटख हुए।
महाशिवरात्रि बारात समिति की ओर से दारानगर स्थित महामृत्युंजय महादेव मंदिर से शाम सात बजे बारात निकली। काशी की गंगा जमुनी तहजीब का संदेश देने वाली बारात में शिव के स्वरूप में सांड़ बनारसी और मां गौरा के रूप में बदरूद्दीन रथ पर सवार होकर निकले तो हर-हर महादेव का जयघोष गूंज उठा। भूत, प्रेत, पिशाच और देवताओं की टोली बारात के पीछे-पीछे चल रही थी। इसमें ढोल-नगाड़े, भूत-प्रेत, सपेरे, मदारी, बंदर, देव स्वरूप में सजे बच्चे और लाग विमान आदि शामिल रहे। बनारसी मस्ती और फागुन का एहसास कराने के लिए होलियाना अंदाज में निकली बारात तो सभी अबीर-गुलाल से सराबोर हो गए। गुजराती डांडिया पर नृत्य सभी के आकर्षण का केंद्र रही। बारात महामृत्यंजय महादेव से निकलकर जैसे ही चितरंजन पार्क पहुंचेगी तो वधू पक्ष दशाश्वमेध व्यवसायी संघ की तरफ से दिलीप तुलस्यान, सुरेश तुलस्यान, नरसिंह बाबा, विजय द्विवेदी, रमेश तिवारी बारातियों का स्वागत किया। दशाश्वमेध घाट पर कलाकारों ने तलवारबाजी और अन्य कला का प्रदर्शन किया।
वहीं दूसरी तरफ तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर से प्रसिद्द शिव बारात में भूत-प्रेत के साथ गणों की टोली आकर्षण का केंद्र थे। बैंड की धुन पर थिरकते हुए सभी भक्त नाचते गाते चल रहे थे। तिलभांडेशवर मंदिर से भगवान् शिव की बारात निकली और घोड़े पर सवार होकर भगवान शंकर नगर भ्रमण करते हुए पार्वती के घर पहुंचे जहां रीति रिवाज के साथ उनका विवाह रचाया गया। शहर के अलग अलग जगहों से अलग अलग समय पर भगवान शिव की बारात निकली। इसके अलावा शिवम् पूजा समिति की ओर से नागेश्वर मिश्र के नेतृत्व में तिलमापुर स्थित रंगीलदास पोखरा से शिव बारात निकली। शिव बारात पोखरा से निकलकर चंद्रा चौराहा, पंचक्रोसी चौराहा, आशापुर चौराहा, हवेलिया चौराहा, आकाशवाणी चौराहा, पुरातात्विक संग्रहालय सारनाथ मुख्य चौराहा होते हुए सारंगनाथ महादेव मंदिर की परिक्रमा के बाद रंगील दास पोखरा पहुंच कर समाप्त हुई।